क्या है पारसी समुदाय? भारतीय इतिहास में इस अद्वितीय और गौरवशाली अल्पसंख्यक समाज का योगदान
फारस से आए ज़रथुश्ती शरणार्थियों की ऐतिहासिक गाथा और आधुनिक भारत के औद्योगिक, वैज्ञानिक व सांस्कृतिक निर्माण में पारसी समाज का अतुलनीय प्रभाव।

भारतीय सभ्यता और संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी स्वीकार्यता रही है। भारत ने सदियों से दुनिया के कोने-कोने से आए पीड़ित और आश्रयहीन समाजों को न केवल अपने आँचल में पनाह दी, बल्कि उन्हें फलने-फूलने का पूरा अवसर भी प्रदान किया। भारतीय उपमहाद्वीप में निवास करने वाला पारसी समुदाय इसी पावन परंपरा का एक सबसे दीप्तिमान और उत्कृष्ट उदाहरण है। पारसी मूल रूप से प्राचीन फारस (आधुनिक ईरान) के निवासी हैं, जो इस्लाम के आगमन और अरब आक्रमणों के बाद अपने मूल धर्म ‘ज़रथुश्ती’ (Zoroastrianism) और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए मातृभूमि छोड़कर भारत आए थे। आज यह समाज भले ही जनसंख्या की दृष्टि से भारत के सबसे छोटे सूक्ष्म-अल्पसंख्यक (Micro-minority) समुदायों में से एक है, लेकिन आधुनिक भारत के निर्माण, यहाँ के उद्योग, विज्ञान, कला और राष्ट्रवाद में इसका योगदान अत्यंत विराट और अतुलनीय रहा है।
इस ऐतिहासिक देशांतरण और भारत के साथ पारसी समुदाय के अनूठे जुड़ाव की कहानी सोलहवीं शताब्दी के सुप्रसिद्ध पारसी महाकाव्य 'किस्सा-ए-संजान' में बेहद मार्मिकता के साथ सुरक्षित है। सातवीं से दसवीं शताब्दी के मध्य जब ससानी साम्राज्य के पतन के बाद ज़रथुश्ती अनुयायियों पर धार्मिक उत्पीड़न बढ़ा, तब वे जलमार्ग से होते हुए सर्वप्रथम काठियावाड़ के दीव पहुंचे और तत्पश्चात दक्षिण गुजरात के संजान तट पर उतरे। वहाँ के स्थानीय राजपूत राजा जदि राना (या जाधव राना) के समक्ष जब शरण की गुहार लगाई गई, तब राजा ने एक भरा हुआ दूध का कटोरा दिखाकर संकेत दिया कि उनका राज्य पहले से ही पूरी तरह भरा हुआ है और यहाँ नए लोगों के लिए स्थान नहीं है। इस पर एक बुद्धिमान पारसी धर्मगुरु ने उस भरे हुए दूध में अत्यंत विनम्रता से शक्कर मिला दी, जो बिना दूध को बाहर बहाए उसमें पूरी तरह घुल गई। इस मूक लेकिन प्रभावी संदेश का तात्पर्य था कि पारसी समाज भारतीय संस्कृति में इस तरह विलीन हो जाएगा कि वह यहाँ की मिठास को तो बढ़ाएगा, परंतु किसी व्यवधान या टकराव का कारण नहीं बनेगा; और इतिहास गवाह है कि पारसियों ने इस वचन को अक्षरों में सच कर दिखाया।
गुजरात की भूमि पर स्थायी रूप से बसने के बाद पारसी समुदाय को स्थानीय शासक द्वारा कुछ विशेष शर्तों का पालन करने का निर्देश दिया गया, जिसमें स्थानीय भाषा (गुजराती) को अपनाना, महिलाओं द्वारा स्थानीय परिधान (साड़ी) धारण करना और अस्त्र-शस्त्र न रखना शामिल था। पारसियों ने इन शर्तों को सहर्ष स्वीकार किया और सदियों तक वे गुजरात और महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों में एक शांत, कृषि-आधारित और व्यापारिक समाज के रूप में जीवनयापन करते रहे। धार्मिक दृष्टिकोण से उनका पवित्र ग्रंथ 'अवेस्ता' है, जिसकी भाषा वैदिक संस्कृत से अत्यधिक मेल खाती है, और वे 'अहुर मज्दा' (प्रकाश और अच्छाई के प्रतीक) को अपना आराध्य मानते हैं। इस समुदाय ने भारत में अपनी धार्मिक पवित्रता को अक्षुण्ण रखने के लिए संजान में अपने प्रथम अग्नि मंदिर (आतिश बेहराम) की स्थापना की, जिसे बाद में नवसारी और अंततः उद्वदा में स्थानांतरित किया गया, जो आज भी पारसियों का सबसे पवित्र तीर्थ स्थल है।
सत्रहवीं शताब्दी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन और बंबई (अब मुंबई) के एक प्रमुख बंदरगाह के रूप में उभरने के बाद पारसी समाज के भाग्य और प्रभाव में एक युगांतकारी परिवर्तन आया। अपनी उच्च साक्षरता, व्यावसायिक ईमानदारी और दूरदर्शिता के कारण पारसी युवाओं ने अंग्रेजी शिक्षा और व्यापारिक प्रणालियों को बहुत तेजी से अपनाया। सूरत और गुजरात के अन्य हिस्सों से निकलकर यह समुदाय बंबई में आकर बस गया और शीघ्र ही वे ब्रिटिश प्रशासन तथा वैश्विक व्यापार के बीच सबसे भरोसेमंद और कुशल कड़ी बन गए। अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में चीन के साथ होने वाले कपास, रेशम और अफीम के व्यापार में पारसी जहाज निर्माताओं और ब्रोकरों ने अपार संपत्ति अर्जित की, जिसने उन्हें भारत के सबसे संपन्न और प्रभावशाली औद्योगिक घरानों में स्थापित कर दिया।
भारतीय इतिहास में पारसी समुदाय का महत्व केवल उनके द्वारा अर्जित धन से नहीं, बल्कि उनके द्वारा किए गए राष्ट्र-निर्माण और अद्वितीय परोपकार (Philanthropy) से आंका जाता है। रुस्तम मानेक, जमशेदजी टाटा, अर्देशिर गोदरेज, होमी जहांगीर भाभा और साइरस पूनावाला जैसी विभूतियों ने भारत को कपड़ा उद्योग, इस्पात, विमानन, परमाणु ऊर्जा और जीवन रक्षक टीकों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया। टाटा समूह ने देश को न केवल पहला स्वदेशी इस्पात संयंत्र दिया, बल्कि अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा, अनुसंधान और अस्पतालों के लिए दान कर दिया। वहीं कला और संस्कृति के क्षेत्र में फ्रेडी मर्करी और बोमन ईरानी से लेकर खेल और सिनेमा तक में इस समुदाय ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। भले ही आधुनिक समय में देर से विवाह और कम जन्मदर के कारण पारसी आबादी में निरंतर गिरावट आ रही है, लेकिन भारतीय सभ्यता के ताने-बाने में उनकी भूमिका हमेशा शक्कर की तरह घुली रहेगी, जो देश के गौरव को निरंतर मीठा और समृद्ध करती आई है।

