भारत की पावन भूमि सदियों से महान संतों और योगियों की जननी रही है, जिन्होंने अपने ज्ञान के प्रकाश से मानवता का मार्ग प्रशस्त किया है। इसी गौरवशाली परंपरा में एक ऐसा देदीप्यमान नाम शामिल है, जिसने सुदूर पश्चिम की भौतिकवादी धरती पर भारतीय आध्यात्मिकता और योग विज्ञान का ऐसा बीजारोपण किया कि उन्हें 'पश्चिम में योग का जनक' माना गया। परमहंस योगानन्द, जिनका मूल नाम मुकुंद लाल घोष था, का जन्म ५ जनवरी १८९३ को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में एक प्रतिष्ठित हिंदू बंगाली कायस्थ परिवार में हुआ था। आठ भाई-बहनों में चौथे और चार बेटों में दूसरे मुकुंद के पिता भगवती चरण घोष बंगाल-नागपुर रेलवे में उपाध्यक्ष थे, जबकि माता ज्ञानप्रभा देवी एक अत्यंत धार्मिक महिला थीं। मुकुंद की आध्यात्मिक चेतना और अनुभव बचपन से ही असाधारण थे और पिता के स्थानांतरण के कारण उनका प्रारंभिक जीवन लाहौर, बरेली और कोलकाता जैसे विभिन्न शहरों में बीता। ग्यारह वर्ष की अल्पायु में ही उनकी माता का देहावसान हो गया, जिन्होंने उनके लिए एक पवित्र ताबीज छोड़ा था जो एक सिद्ध पुरुष द्वारा दिया गया था। बचपन से ही उनके पिता उन्हें तीर्थयात्राओं के लिए पास उपलब्ध कराते थे, जिसके चलते उन्होंने सोहम 'टाइगर' स्वामी, गंध बाबा और महेंद्रनाथ गुप्ता जैसे भारत के कई संतों और ऋषियों की खोज की ताकि वे अपने आध्यात्मिक मार्ग के लिए एक प्रबुद्ध गुरु पा सकें।

उच्च विद्यालय की शिक्षा पूर्ण करने के बाद मुकुंद ने औपचारिक रूप से घर छोड़ दिया और वाराणसी के एक महामंडल आश्रम में शामिल हो गए, लेकिन वहां ध्यान और ईश्वर-साक्षात्कार के बजाय संगठनात्मक कार्यों पर अत्यधिक जोर दिए जाने के कारण वे जल्द ही असंतुष्ट हो गए। ईश्वर से मार्गदर्शन की प्रार्थना करते हुए वर्ष १९१० में मात्र सत्रह वर्ष की आयु में उनकी मुलाकात अपने आध्यात्मिक गुरु स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि से हुई, जिसके साथ ही उनकी गुरु की खोज समाप्त हो गई और उस पवित्र ताबीज का आध्यात्मिक उद्देश्य पूरा होने पर वह रहस्यमयी रूप से गायब हो गया। श्री युक्तेश्वर जी के आश्रम में उन्होंने अगले दस वर्षों तक कठोर प्रशिक्षण प्राप्त किया और वर्ष १९१५ में कलकत्ता के स्कॉटिश चर्च कॉलेज से इंटरमीडिएट तथा सेरामपुर कॉलेज से कला स्नातक की डिग्री प्राप्त की। कॉलेज पूरा करने के कुछ ही सप्ताह बाद जुलाई १९१५ में उन्होंने औपचारिक रूप से संन्यास की दीक्षा ली और स्वामी योगानन्द गिरि के नाम से जाने गए। वर्ष १९१७ में उन्होंने पश्चिम बंगाल के दिहिका में लड़कों के लिए एक स्कूल की स्थापना की, जहां आधुनिक शिक्षा के साथ योग और आध्यात्मिक आदर्शों का समन्वय था, जिसे बाद में रांची स्थानांतरित कर दिया गया और यही संस्थान आगे चलकर 'योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया' के रूप में विकसित हुआ।

वर्ष १९२० में रांची में ध्यान के दौरान योगानन्द जी को एक दिव्य अनुभूति हुई जिसमें उन्होंने अनगिनत अमेरिकियों के चेहरे देखे, जो इस बात का संकेत था कि उन्हें जल्द ही अमेरिका जाना है। इसके तुरंत बाद उन्हें बोस्टन में आयोजित होने वाले इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ रिलिजियस लिबरल्स में भारत के प्रतिनिधि के रूप में शामिल होने का निमंत्रण मिला और उनके गुरु तथा स्वयं महाअवतार बाबाजी ने उन्हें पश्चिम में क्रिया योग फैलाने की आज्ञा दी। अगस्त १९२० में वे 'द सिटी ऑफ स्पार्टा' नामक जहाज से अमेरिका के लिए रवाना हुए और बोस्टन पहुंचकर अपने प्रभावशाली व्याख्यान से सबका दिल जीत लिया। इसी वर्ष उन्होंने प्राचीन भारतीय दर्शन और ध्यान पद्धतियों के प्रचार-प्रसार के लिए 'सेल्फ-रियलाइजेशन फेलोशिप' (एसआरएफ) की स्थापना की। उन्होंने अगले चार वर्षों तक पूर्वी तट पर प्रचार किया और १९२४ में एक महाद्वीपीय दौरे पर निकले, जिसके बाद १९२५ में उन्होंने लॉस एंजिल्स, कैलिफोर्निया में एसआरएफ का अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय स्थापित किया। वे अमेरिका में अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा बिताने वाले पहले हिंदू योग शिक्षक बने और वर्ष १९२७ में राष्ट्रपति कैल्विन कूलिज द्वारा व्हाइट हाउस में आमंत्रित किए जाने वाले पहले प्रमुख भारतीय बने, जिसके बाद लॉस एंजिल्स टाइम्स ने उन्हें 'बीसवीं सदी का पहला सुपरस्टार गुरु' कहा।

पश्चिम में उनका यह सफर चुनौतियों से रहित नहीं था; भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के कारण वे ब्रिटिश और अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई की निगरानी सूची में रहे और उन्हें नस्लीय रूढ़िवादिता तथा धार्मिक कट्टरता का भी सामना करना पड़ा, यहां तक कि वर्ष १९२८ में मियामी में उनकी सुरक्षा का हवाला देकर सार्वजनिक कार्यक्रमों पर रोक लगा दी गई थी। वर्ष १९२९ में उनके एक पुराने सहयोगी द्वारा उन पर मुकदमा भी दायर किया गया और कई दशकों बाद एक पितृत्व विवाद भी सामने आया, जिसे वर्ष २००२ में डीएनए जांच के जरिए पूरी तरह से खारिज कर दिया गया और योगानन्द जी की पवित्रता अकाट्य साबित हुई। वर्ष १९३५ में वे यूरोप और मध्य पूर्व के आध्यात्मिक स्थलों का दौरा करते हुए वापस भारत लौटे, जहां उनका भव्य स्वागत हुआ। इस यात्रा के दौरान उन्होंने महात्मा गांधी को क्रिया योग की दीक्षा दी, आनंदमयी मां और भौतिक विज्ञानी सी. वी. रमण से मुलाकात की तथा उनके गुरु श्री युक्तेश्वर जी ने उन्हें 'परमहंस' की सर्वोच्च आध्यात्मिक उपाधि से विभूषित किया। मार्च १९३६ में उनके गुरु के महासमाधि लेने के बाद, उन्होंने मुंबई के एक होटल में अपने गुरु के पुनर्जीवित रूप का अलौकिक साक्षात्कार किया, जिन्होंने उन्हें ब्रह्मांडीय रहस्यों का ज्ञान दिया।

अक्टूबर १९३६ में अमेरिका लौटने के बाद उन्होंने कैलिफोर्निया के एनसिinitas में रहकर अपनी कालजयी पुस्तक 'ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी' (एक योगी की आत्मकथा) लिखी, जो १९४६ में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक को बीसवीं सदी की १०० सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक पुस्तकों में गिना गया और इसने एप्पल के पूर्व सीईओ स्टीव जॉब्स, जॉर्ज हैरिसन और एल्विस प्रेस्ली जैसे दिग्गजों के जीवन को गहराई से प्रभावित किया। वर्ष १९४९ में वे अमेरिका के प्राकृतिक नागरिक बने और अपने जीवन के अंतिम वर्ष एकांत में लेखन कार्य को समर्पित कर दिए। ७ मार्च १९५२ को लॉस एंजिल्स के बिल्टमोर होटल में भारतीय राजदूत विनय रंजन सेन के सम्मान में आयोजित भोज में एक ओजस्वी भाषण देने और अपनी कविता 'माय इंडिया' की अंतिम पंक्तियां पढ़ने के तुरंत बाद उन्होंने सचेत रूप से अपने शरीर का त्याग कर दिया, जिसे योग परंपरा में महासमाधि और चिकित्सा विज्ञान में दिल का दौरा कहा जाता है। मृत्यु के तीन सप्ताह बाद तक उनके पार्थिव शरीर में सड़न या क्षय का कोई भी लक्षण दिखाई नहीं दिया, जिसे शवगृह के निदेशक ने अपने इतिहास की सबसे अभूतपूर्व और अद्वितीय घटना बताया। परमहंस योगानन्द जी की शिक्षाएं आज भी दुनिया भर के करोड़ों लोगों को आत्म-साक्षात्कार, मानसिक शांति और ईश्वर से सीधे जुड़ाव का मार्ग दिखा रही हैं, जो पूर्व और पश्चिम के आध्यात्मिक समन्वय के अमर प्रतीक हैं।

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