मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास में त्याग और स्वामिभक्ति की जब भी चर्चा होती है, तो पन्ना धाय का नाम सबसे पहले और सबसे ऊंचे स्थान पर अंकित मिलता है। खींची चौहान राजपूत वंश में जन्मीं पन्ना, जिन्हें 'पन्ना खींची' के नाम से भी जाना जाता है, राणा सांगा के पुत्र उदय सिंह की धाय माँ थीं। यह वह कालखंड था जब चित्तौड़ संकटों से घिरा हुआ था और रानी कर्णावती ने गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के आक्रमण के समय जौहर करने से पूर्व राजकुमार उदय सिंह के पालन-पोषण और सुरक्षा का गुरुतर भार पन्ना धाय के हाथों में सौंपा था। पन्ना ने न केवल राजकुमार को अपना दूध पिलाया, बल्कि एक रक्षक की भांति उनके जीवन की ढाल बनकर खड़ी रहीं। नियति ने उनकी परीक्षा तब ली जब दासी पुत्र बनवीर ने सत्ता के लालच में महाराणा विक्रमादित्य की हत्या कर दी और नन्हे उदय सिंह को भी रास्ते से हटाने के लिए उनके महल की ओर बढ़ा। इस भयानक साजिश की सूचना जब पन्ना को एक बारी (पत्तल बनाने वाले) के माध्यम से मिली, तो उन्होंने विचलित होने के बजाय अपने कर्तव्य को सर्वोपरि रखा।

राजकुमार की जान बचाने के लिए पन्ना धाय ने एक अत्यंत साहसी और हृदयविदारक योजना बनाई। उन्होंने उदय सिंह को एक बांस की टोकरी में छिपाकर पत्तलों से ढंक दिया और एक विश्वसनीय महिला के साथ सुरक्षित रूप से किले से बाहर भेज दिया। बनवीर को भ्रमित करने के लिए उन्होंने उदय सिंह के बिस्तर पर अपने ही पुत्र चंदन को सुला दिया, जो आयु में राजकुमार के समान ही था। जब बनवीर हाथ में खून से सनी तलवार लेकर कमरे में दाखिल हुआ और कड़कती आवाज में राजकुमार का पता पूछा, तो पन्ना ने अडिग रहते हुए पत्थर के समान कलेजे के साथ अपने पुत्र की ओर इशारा कर दिया। बनवीर ने पन्ना की आंखों के सामने ही चंदन को राजकुमार समझकर मौत के घाट उतार दिया। ममता की उस करुण पुकार को अपने भीतर दबाते हुए पन्ना एक शब्द भी नहीं बोलीं, ताकि हत्यारा यह न जान सके कि असली राजकुमार जीवित है। पुत्र के बलिदान के बाद उन्होंने चुपचाप उसके शव को चूमा और बिना विलाप किए राजकुमार उदय सिंह को सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए निकल पड़ीं।

चित्तौड़ के दुर्ग से निकलकर पन्ना धाय राजकुमार को लेकर अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए कुंभलगढ़ पहुंचीं। वहां के किलेदार आशा देपुरा ने, अपनी माता के प्रोत्साहन पर, जोखिम उठाते हुए उदय सिंह को शरण दी। पन्ना के इसी महान त्याग का परिणाम था कि वर्ष 1536 में मेवाड़ी सरदारों ने उदय सिंह को महाराणा घोषित किया और अंततः 1540 में उन्होंने चित्तौड़ पर पुनः अधिकार प्राप्त किया। पन्ना धाय का यह बलिदान न केवल राजस्थान बल्कि विश्व इतिहास में अद्वितीय है, जिसने मेवाड़ के वंश को विलुप्त होने से बचा लिया। उनके इस शौर्य और स्वामिभक्ति को 'राजमुकुट' और 'दीपदान' जैसे कालजयी नाटकों तथा कई ऐतिहासिक फिल्मों के माध्यम से पीढ़ियों तक पहुँचाया गया है। आज भी पन्ना धाय का नाम उस महान परंपरा का प्रतीक है, जहाँ राष्ट्र और स्वामी के प्रति निष्ठा के सामने स्वयं के रक्त का मोह भी गौण हो जाता है। उनकी अमर गाथा हमें सिखाती है कि बलिदान की पराकाष्ठा ही किसी व्यक्तित्व को इतिहास के पन्नों में अमर बनाती है।

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