कौन थे पाबूजी? ऊंटों के देवता और शरणागत की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर करने वाले 'महान लोकनायक'
कोलूगढ़ के राजकुमार पाबूजी ने देवल की गायों की रक्षा के लिए अपने विवाह के फेरों को बीच में त्याग कर वीरगति प्राप्त की थी।

राजस्थान, गुजरात और सिंध के विस्तृत रेतीले धोरों में एक ऐसे लोक-देवता की मान्यता सर्वोपरि है, जिन्होंने न केवल पशुधन की रक्षा की, बल्कि अपने वचनों के लिए रणभूमि में प्राणों की आहुति दे दी। कोलूगढ़ के शासक परिवार में जन्मे पाबूजी राठौड़ के जीवन की गाथा वीरता, त्याग और न्याय की रक्षा के अनूठे मेल से बनी है। उनका जीवन एक साधारण राजकुमार के रूप में नहीं, बल्कि जनमानस के रक्षक और विशेष रूप से ऊंटों के उपचारक देवता के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। इस गौरवशाली गाथा का आरंभ मारवाड़ क्षेत्र की एक साहसी पशुपालक देवल से जुड़ा है, जो अपनी अपार शक्ति और अदम्य साहस के लिए विख्यात थीं। उनके पास 'केसर कालमी' नामक एक दिव्य और शक्तिशाली काली घोड़ी थी, जिस पर जायल के सामंत जींद राव की कुदृष्टि थी। जब देवल ने अपनी प्रिय घोड़ी को देने से इनकार कर दिया, तब उन्हें सुरक्षा की तलाश में कोलूगढ़ के दरबार में शरण लेनी पड़ी। पाबूजी ने न केवल उन्हें अपनी पुत्री तुल्य मानकर संरक्षण दिया, बल्कि उनकी गौ-संपदा की रक्षा का वचन भी दिया। समय के साथ यह संबंध भक्ति और सम्मान की गहराइयों में उतरता गया, जहां देवल देवी ने पाबूजी के प्रति अपनी अटूट आस्था प्रकट की। संघर्ष का निर्णायक मोड़ तब आया जब जींद राव ने प्रतिशोध स्वरूप देवल की गायों का अपहरण कर लिया। उस समय पाबूजी अपने विवाह के फेरों के मध्य बैठे थे, किंतु देवल के पुकारते ही उन्होंने अपने सांसारिक सुखों को त्याग दिया और 'केसर कालमी' पर सवार होकर अपनी सेना के साथ युद्ध के मैदान में कूद पड़े। भीषण संग्राम में अपनी वीरता का लोहा मनवाते हुए पाबूजी ने गायों को तो मुक्त करा लिया, लेकिन इस धर्मयुद्ध में वे स्वयं वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी इसी निस्वार्थ सेवा और बलिदान ने उन्हें एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व से ऊपर उठाकर भगवान का दर्जा दिला दिया। आज भी राजस्थान के फलौदी स्थित कोलू गाँव, जिसे 'कोलू पाबूजी' के नाम से जाना जाता है, उनकी स्मृतियों को संजोए हुए है और सरकार द्वारा वहां बनाया गया उनका पैनोरमा भावी पीढ़ियों को उनके शौर्य की याद दिलाता है।

