मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के एक छोटे से गाँव कुचवाड़ा में ११ दिसंबर १९३१ को कपड़ा व्यापारी बाबूलाल और सरस्वती जैन के घर जन्मे चंद्रमोहन जैन ही आगे चलकर इतिहास में आचार्य रजनीश, भगवान श्री रजनीश और अंततः 'ओशो' के नाम से विख्यात हुए। ग्यारह भाई-बहनों में सबसे बड़े चंद्रमोहन को बचपन में उनके नाना-नानी के पास रहने के लिए भेज दिया गया था, जहाँ उनकी नानी ने उन्हें किसी भी प्रकार की थोपी गई शिक्षा या प्रतिबंधों से सर्वथा मुक्त रखा। इस उन्मुक्त वातावरण ने उनके आगामी जीवन की स्वतंत्र वैचारिक नींव रखी। सात वर्ष की आयु में नाना के निधन और पंद्रह वर्ष की आयु में अपनी बचपन की मित्र शशि की टाइफाइड से हुई मृत्यु ने उनके मानस पर गहरा आघात किया, जिससे उनके भीतर मृत्यु और जीवन के रहस्यों को जानने की तीव्र जिज्ञासा उत्पन्न हो गई। अपने स्कूली दिनों में वे एक अत्यंत मेधावी, विद्रोही और अकाट्य तर्क देने वाले छात्र के रूप में उभरे। वे पारंपरिक धर्मों के कटु आलोचक बन गए और चेतना के विस्तार के लिए श्वास नियंत्रण, योग, ध्यान, उपवास, तंत्र और सम्मोहन जैसी विभिन्न पद्धतियों का गहराई से अध्ययन करने लगे। युवावस्था में मार्क्स और एंगेल्स के विचारों से प्रभावित होने के कारण उन्हें साम्यवादी भी माना गया, और उन्होंने अपने मित्रों के सहयोग से साम्यवादी साहित्यों का एक विशाल पुस्तकालय भी निर्मित किया था। साम्यवाद के बाद उनका झुकाव अराजकतावाद के विचारक जैसे प्रिंस क्रोपोटकिन, बाकुनिन और लियो टॉल्स्टॉय की ओर हुआ, क्योंकि वे किसी भी राज्य या सरकार के नियंत्रण के पूर्णतः विरुद्ध थे। वे अल्पकाल के लिए समाजवाद और भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) जैसे राष्ट्रवादी संगठनों से भी जुड़े, परंतु किसी बाहरी अनुशासन या बंधी-बंधाई विचारधारा में न बंध पाने के कारण वे इनसे शीघ्र ही अलग हो गए।

वर्ष १९५१ में उन्नीस वर्ष की आयु में उन्होंने जबलपुर के हितकारिणी कॉलेज से अपनी उच्च शिक्षा प्रारंभ की, लेकिन एक शिक्षक के साथ वैचारिक मतभेद के कारण उन्हें कॉलेज छोड़ना पड़ा और उन्होंने डी.एन.जैन कॉलेज में दाखिला लिया। अपने विद्रोही स्वभाव के कारण उन्हें परीक्षा के अलावा कक्षाओं में आने से छूट मिल गई, जिसका उपयोग उन्होंने एक स्थानीय समाचार पत्र में सहायक संपादक के रूप में काम करके किया। इसी दौरान वर्ष १९५१ से १९६८ तक वे जबलपुर में आयोजित होने वाले 'सर्व धर्म सम्मेलन' में निरंतर व्याख्यान देते रहे और उन्होंने माता-पिता द्वारा विवाह के दबाव को भी पूरी तरह खारिज कर दिया। आचार्य रजनीश के अनुसार, २१ मार्च १९५३ को इक्कीस वर्ष की आयु में जबलपुर के भंवरताल गार्डन में एक वृक्ष के नीचे बैठे हुए उन्हें परम आध्यात्मिक ज्ञान यानी आत्मज्ञान (Enlightenment) की प्राप्ति हुई थी। १९५५ में दर्शनशास्त्र में स्नातक करने के बाद उन्होंने सागर विश्वविद्यालय से १९५७ में सर्वोच्च अंकों के साथ स्नातकोत्तर (MA) की उपाधि प्राप्त की। इसके तुरंत बाद उन्हें रायपुर संस्कृत कॉलेज में प्रवक्ता नियुक्त किया गया, लेकिन छात्रों की नैतिकता और चरित्र के प्रति 'खतरनाक' माने जाने के कारण कुलपति ने उनका स्थानांतरण कर दिया। इसके बाद उन्होंने १९५८ से जबलपुर विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक के रूप में कार्य किया और १९६० में वे प्रोफेसर बन गए। एक बेहद लोकप्रिय और प्रखर वक्ता के रूप में वे अपने सहयोगियों के बीच काफी विख्यात थे। विश्वविद्यालय की नौकरी के साथ-साथ उन्होंने पूरे भारत में 'आचार्य रजनीश' के नाम से यात्राएं शुरू कीं। लगातार रेल यात्राओं के कारण उन्हें सामान्य बिस्तरों के बजाय रेल की बर्थ की तरह हिलते हुए सोने की आदत पड़ गई थी। अपने देशव्यापी व्याख्यानों में वे समाजवाद, महात्मा गांधी और संस्थागत धर्मों की तीखी आलोचना करते थे। उनका मानना था कि समाजवाद केवल गरीबी का समाजीकरण करेगा, जबकि भारत को अपनी संकीर्णता से बाहर निकलने के लिए पूंजीवाद, विज्ञान, आधुनिक तकनीक और जनसंख्या नियंत्रण की आवश्यकता है। उन्होंने पारंपरिक भारतीय धर्मों को खोखली रीतियों से युक्त और भय पर आधारित बताया। इन बयानों ने उन्हें अत्यधिक विवादास्पद बना दिया, लेकिन साथ ही अमीर व्यापारियों का एक ऐसा समर्पित वर्ग भी तैयार हुआ जो उनके जीवन दर्शन से प्रभावित होकर उन्हें भारी दान देने लगा। १९६२ से उन्होंने ध्यान शिविरों का आयोजन शुरू किया और उनके विचारों के इर्द-गिर्द 'जीवन जागृति आंदोलन' के केंद्रों की स्थापना हुई। १९६६ में एक विवादास्पद व्याख्यान दौरे के बाद विश्वविद्यालय के आग्रह पर उन्होंने अपने प्रोफेसर पद से त्यागपत्र दे दिया।

१९६८ में उनके व्याख्यानों की एक श्रृंखला 'संभोग से समाधि की ओर' (Sex Matters: From Sex to Superconsciousness) शीर्षक से प्रकाशित हुई, जिसने पूरे देश के रूढ़िवादी धार्मिक नेताओं को झकझोर कर रख दिया और भारतीय मीडिया ने उन्हें 'सेक्स गुरु' का नाम दे दिया। इसके बाद १९६९ में द्वितीय विश्व हिंदू सम्मेलन में उन्होंने जीवन को दुखों से भरा मानने वाले धर्मों को नकारते हुए धर्म को जीवन जीने और आनंद मनाने की कला बताया, जहाँ पुरी के शंकराचार्य ने उनके भाषण को रुकवाने का निष्फल प्रयास भी किया। १९७० में मुंबई आकर उन्होंने पहली बार अपनी अनूठी 'डायनेमिक मेडिटेशन' (सक्रिय ध्यान) पद्धति को दुनिया के सामने रखा, जिसमें तीव्र श्वास, संगीत और नृत्य का समावेश था। इसी वर्ष सितंबर में उन्होंने अपने अनुयायियों को 'नव-सन्यास' में दीक्षित करना शुरू किया, जहाँ सन्यासियों को पारंपरिक सन्यासियों की तरह वैराग्य के बजाय जीवन को भरपूर उत्सव के साथ जीने के लिए प्रेरित किया गया। इस दौरान उनकी पहली शिष्या मा योग लक्ष्मी उनकी सचिव बनीं, जिन्होंने रजनीश के देश-विदेश में प्रसार के लिए धन जुटाया। १९७१ में उन्होंने स्वयं को 'भगवान श्री रजनीश' की उपाधि से विभूषित किया, जिसे उन्होंने एक प्रतीक बताया ताकि केवल वही सच्चे साधक उनके पास रुकें जो अहंकार को छोड़कर पूरी तरह समर्पित होने के लिए तैयार हों। मुंबई की आबोहवा में उन्हें मधुमेह और अस्थमा जैसी स्वास्थ्य समस्याओं ने घेर लिया, जिसके चलते १९७४ में वे पुणे के कोरेगांव पार्क में स्थानांतरित हो गए। यहाँ छह एकड़ भूमि पर एक भव्य आश्रम की स्थापना हुई, जो आज का 'ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिजॉर्ट' है। पुणे आश्रम में उनके प्रवचनों की ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग होने लगी, जिसने वैश्विक स्तर पर पश्चिमी देशों के जिज्ञासुओं को भारी संख्या में आकर्षित किया। आश्रम में ध्यान पद्धतियों के साथ-साथ 'ह्यूमन पोटेंशियल मूवमेंट' के थेरेपिस्टों द्वारा विभिन्न प्रकार की मानसिक और शारीरिक थेरेपी दी जाने लगीं, जो विवादों और गंभीर शारीरिक चोटों की खबरों के कारण अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में भी रहीं। १९७० के दशक के उत्तरार्ध में मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार के साथ आश्रम के संबंध बेहद तनावपूर्ण हो गए; सरकार ने आश्रम के टैक्स-फ्री दर्जे को समाप्त कर पांच मिलियन डॉलर के टैक्स की मांग कर दी और विदेशी नागरिकों के वीजा पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए। मई १९८० में विलास तुपे नामक एक हिंदू दक्षिणपंथी युवक ने प्रवचन के दौरान उन पर जानलेवा हमला भी किया, जिसका दावा था कि रजनीश सीआईए (CIA) के एजेंट हैं। विवादों के चरम पर पहुंचने और बिगड़ते स्वास्थ्य के बीच अप्रैल १९८१ में रजनीश साढ़े तीन साल के स्वैच्छिक मौन में चले गए, और मा आनंद शीला उनकी नई सचिव बनीं।

भारत सरकार के बढ़ते दबाव के कारण जून १९८१ में रजनीश चिकित्सा कारणों का हवाला देकर पर्यटक वीजा पर अमेरिका चले गए और न्यू जर्सी के 'किप्स कैसल' में कुछ समय बिताने के बाद ओरेगन के वास्को काउंटी में ६४,२२९ एकड़ का एक विशाल रेंच खरीदा, जिसे 'रजनीशपुरम' नाम दिया गया। जल्द ही स्थानीय अमेरिकी निवासियों और राज्य सरकार के साथ भूमि उपयोग और कानूनी अधिकारों को लेकर आश्रम का भीषण टकराव शुरू हो गया। इस मौन काल के दौरान रजनीश पृष्ठभूमि में रहे और केवल अपनी सचिव मा आनंद शीला से ही संवाद करते थे। इसी समय उनके पास ९३ रॉल्स-रॉयस कारों का एक अभूतपूर्व बेड़ा इकट्ठा हुआ, जिसने उन्हें वैश्विक मीडिया में कौतूहल और विवाद का केंद्र बना दिया। ओरेगन के दिनों में उन्होंने परमाणु युद्ध और ९० के दशक में एड्स से मानवता के विनाश की भविष्यवाणियां कीं, जिसके चलते आश्रम में रबर के दस्ताने और कंडोम का उपयोग अनिवार्य कर दिया गया। ओरेगन का यह साम्राज्य तब बिखर गया जब १९८५ में मा आनंद शीला और उनके कुछ करीबियों पर चुनाव प्रभावित करने के लिए स्थानीय आबादी को बायो-टेररिज्म (Mass Food-Poisoning) के जरिए बीमार करने, अमेरिकी अटॉर्नी की हत्या की साजिश रचने और रजनीश के निजी डॉक्टर की हत्या के प्रयास जैसे संगीन आरोप लगे। रजनीश ने स्वयं अधिकारियों को बुलाकर जांच करने को कहा, जिसके बाद शीला को सजा हुई और रजनीश को आव्रजन कानूनों के उल्लंघन (Immigration Fraud) के आरोपों के तहत अल्फोर्ड याचिका (Alford Plea) के समझौते के बाद अमेरिका से निर्वासित कर दिया गया। अमेरिका से निकाले जाने के बाद दुनिया के २१ देशों ने उन्हें अपने यहाँ प्रवेश देने से मना कर दिया। अंततः १९८६ में वे वापस मुंबई आए और जनवरी १९८७ में पुनः पुणे आश्रम लौट आए, जहाँ उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्ष बिताए और १९ जनवरी १९९० को इस नश्वर संसार को अलविदा कह दिया।

ओशो एक ऐसे असाधारण विचारक, दार्शनिक और विद्रोही रहस्यवादी के रूप में इतिहास में दर्ज हैं जिन्होंने अध्यात्म को किसी एक संकीर्ण धार्मिक व्यवस्था या रूढ़िवादिता में बांधने का पुरजोर विरोध किया। उनका यह दर्शन कि आध्यात्मिक अनुभव को किसी लीक पर नहीं चलाया जा सकता, आज भी पूरी दुनिया के आधुनिक विचारों और न्यू एज मूवमेंट (New Age Thought) को गहराई से प्रभावित कर रहा है। जीवन को संपूर्णता में जीने, पारंपरिक सन्यास के स्थान पर उत्सवधर्मी सन्यास को अपनाने और ध्यान को आधुनिक मनुष्य की मानसिक शांति का साधन बनाने की उनकी अनूठी विरासत आज भी उनके साहित्य, विचारों और इंटरनेशनल मेडिटेशन रिजॉर्ट के माध्यम से वैश्विक स्तर पर जीवित है और उनकी मृत्यु के बाद उनकी लोकप्रियता में निरंतर अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।

Pratahkal HQ

Pratahkal HQ

Next Story