नवपाषाण काल की ऐतिहासिक धरोहर के रूप में नवपाषाणकालीन ऐशमाउंड्स आज भी भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन मानव जीवन की जटिल सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना की मौन गवाही देते हैं। दक्षिण भारत के दक्कन पठार पर फैले ये राख-टीले न केवल पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि लगभग 3200 से 1200 ईसा पूर्व के बीच मानव समुदाय किस प्रकार पशुपालन, कृषि और अनुष्ठानिक गतिविधियों के साथ संगठित जीवन जीते थे। आधुनिक अनुसंधानों ने इन्हें केवल आकस्मिक अवशेष मानने की पारंपरिक धारणा को चुनौती देते हुए इन्हें बहुउद्देशीय सांस्कृतिक स्थलों के रूप में स्थापित किया है।

इन ऐशमाउंड्स का निर्माण मुख्यतः उन प्रारंभिक कृषक-पशुपालक समुदायों द्वारा किया गया माना जाता है, जो गोबर, लकड़ी और पशु अवशेषों को एकत्र कर उन्हें बार-बार जलाने की प्रक्रिया अपनाते थे। इस सतत दहन प्रक्रिया के परिणामस्वरूप बनी राख समय के साथ परतदार संरचनाओं में बदल गई, जिनमें मिट्टी, राख, पत्थर के औजार, मृदभांड और पशु-अस्थियाँ भी संरक्षित हो गईं। वैज्ञानिक विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ है कि इनमें उच्च तापमान पर दहन के प्रमाण मौजूद हैं, जहाँ पौधों के भीतर उपस्थित सिलिका युक्त फाइटोलिथ्स भी पिघलकर संरचनात्मक रूप से सुरक्षित रह गए, जो उस समय की पर्यावरणीय परिस्थितियों और पशु आहार प्रणाली को समझने में सहायक हैं।

भौगोलिक दृष्टि से ऐशमाउंड्स का वितरण दक्कन पठार की स्थिर भू-रचनात्मक संरचना और अर्ध-शुष्क जलवायु से गहराई से जुड़ा हुआ है, जहाँ कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के नदी घाटी क्षेत्रों—विशेषकर तुंगभद्रा, कृष्णा और हगारी—में इन स्थलों की अधिकता पाई जाती है। उतनूर, कुपगल, सानगनकल्लु, मास्की, टेक्कलकोटा और पल्लवॉय जैसे अनेक स्थलों ने यह स्पष्ट किया है कि यह क्षेत्र न केवल बसावट का केंद्र था, बल्कि प्रारंभिक मानव समुदायों के लिए संसाधन-समृद्ध और अनुकूल पारिस्थितिक क्षेत्र भी था।

उन्नीसवीं शताब्दी से ही इन स्थलों ने विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया, जब कॉलिन मैकेंज़ी और थॉमस जे. न्यूबोल्ड जैसे शोधकर्ताओं ने इन्हें प्राकृतिक ज्वालामुखीय अवशेषों के बजाय मानव-निर्मित संरचनाएँ बताया। आगे चलकर रॉबर्ट ब्रूस फूटे ने 200 से अधिक स्थलों का दस्तावेजीकरण कर इन्हें नवपाषाण काल से जोड़ा और इनके निर्माण में पशु गोबर तथा मानव गतिविधियों की भूमिका को स्पष्ट किया। बीसवीं शताब्दी में फ्रैंक रेमंड ऑलचिन ने इनके स्तरीय अध्ययन के माध्यम से इन्हें मौसमी पशु शिविरों से जोड़ने की व्याख्या प्रस्तुत की, जबकि के. पड्डय्या के शोध ने इन्हें स्थायी बस्तियों के सामुदायिक अपशिष्ट और अनुष्ठानिक दहन स्थलों के रूप में पुनर्परिभाषित किया।

समकालीन पुरातात्विक और पुरा-वनस्पति अध्ययनों से यह भी सामने आया है कि इन स्थलों पर बाजरा जैसी फसलों, विशेषकर ब्रैकिएरिया रामोसा और सेटेरिया वर्टिसिलाटा, तथा दलहनों जैसे मूंग और कुल्थी की उपस्थिति कृषि गतिविधियों की पुष्टि करती है। इसके साथ ही पशु अवशेषों में गाय, भैंस और सूअर की प्रधानता यह संकेत देती है कि उस समय का समाज एक विकसित पशुपालक और कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर था। हालांकि, हाल के वर्षों में विकास परियोजनाओं के कारण कुछ महत्वपूर्ण ऐशमाउंड्स स्थलों का विनाश यह दर्शाता है कि यह अनमोल धरोहर आज भी संरक्षण की गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है।

Pratahkal HQ

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