बीसवीं सदी के महान आध्यात्मिक संतों में शुमार नीम करौली बाबा, जिन्हें उनके अनुयायी श्रद्धा से 'महाराज-जी' कहकर पुकारते हैं, भारतीय अध्यात्म के आकाश में एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र रहे हैं जिन्होंने न केवल देश बल्कि विदेशों में भी सनातन संस्कृति और भक्ति की अलख जगाई। उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले के अकबरपुर गांव में लगभग वर्ष 1900 में एक समृद्ध ब्राह्मण परिवार में जन्मे लक्ष्मण नारायण शर्मा के रूप में उनके जीवन की यात्रा शुरू हुई थी। मात्र 11 वर्ष की अल्पायु में माता-पिता द्वारा विवाह कर दिए जाने के बाद, सांसारिक बंधनों से परे अध्यात्म की खोज में उन्होंने अपना घर छोड़ दिया और एक परिव्राजक साधु यानी तपस्वी के रूप में विचरण करने लगे। इस तपस्या के दौरान उन्हें बाबा लक्ष्मण दास के नाम से जाना गया और उन्होंने वर्ष 1958 तक संपूर्ण उत्तर भारत की यात्राएं कीं, जिसके बाद अपने पिता के विशेष अनुरोध पर वे पुनः गृहस्थ जीवन में लौटे और एक अनुशासित विवाहित जीवन व्यतीत करते हुए दो पुत्रों और एक पुत्री के पिता बने।

संसार और वैराग्य के इसी अद्भुत संतुलन के बीच उनके आध्यात्मिक सफर ने एक ऐसा मोड़ लिया जिसने लाखों लोगों के जीवन को बदल दिया। उन्होंने अपने जीवनकाल में जनमानस के कल्याण के लिए कई सेवा कार्यों की शुरुआत की, जिसके तहत उनके मार्गदर्शन में लगभग 100 से अधिक मंदिरों का निर्माण कराया गया। उनके मुख्य केंद्रों में नैनीताल के समीप स्थित कैंची धाम और वृंदावन के आश्रम प्रमुख रहे हैं, जहाँ वर्ष 1964 में उन्होंने कैंची धाम में एक भव्य हनुमान जी मंदिर और आश्रम की स्थापना की और अपने जीवन का अंतिम दशक मुख्य रूप से यहीं व्यतीत किया। 11 सितंबर 1973 को तड़के लगभग 1:15 बजे वृंदावन के एक अस्पताल में मधुमेह की कोमा (diabetic coma) के कारण उनका महाप्रयाण हुआ। वे आगरा में सीने में दर्द के कारण हृदय रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेकर रात की ट्रेन से कैंची लौट रहे थे, तभी मथुरा रेलवे स्टेशन पर तबीयत बिगड़ने के कारण उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहाँ "जय जगदीश हरे" के अंतिम शब्दों का बार-बार उच्चारण करते हुए उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए और बाद में वृंदावन आश्रम परिसर में ही उनकी पवित्र समाधि का निर्माण किया गया।

बाबा नीम करौली जी का भौतिक शरीर भले ही पंचतत्व में विलीन हो गया, लेकिन उनकी शिक्षाओं और प्रेम के संदेश की विरासत आज भी दुनिया भर में जीवित है और लगातार फल-फूल रही है। उनके महासमाधि लेने के बाद उनके प्रमुख अमेरिकी शिष्यों राम दास और लैरी ब्रिलियंट ने कैलिफोर्निया के बर्कले में 'सेवा फाउंडेशन' जैसी अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्था की स्थापना की, जबकि उत्तरवर्ती वर्षों में उनकी शिक्षाओं के प्रसार के लिए 'लव सर्व रिमेंबर फाउंडेशन' और वर्ष 2024 में उनके अनुयायी राहुल वर्मा द्वारा 'एनकेबी डिवाइन मेडिटेशन फाउंडेशन' का गठन किया गया जो निःशुल्क ध्यान सत्र आयोजित करता है। आज भी हर साल 15 जून को कैंची धाम के स्थापना दिवस पर आयोजित होने वाले विशाल मेले में देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु बाबा के प्रति अपनी अटूट आस्था प्रकट करने पहुँचते हैं, जो इस बात का जीवंत प्रमाण है कि निस्वार्थ सेवा, करुणा और ईश्वर भक्ति की जो लौ महाराज-जी ने जलाई थी, वह युगों-युगों तक मानवता का मार्ग प्रशस्त करती रहेगी।

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