लड़कियों जैसी वेश-भूषा, आत्माओं से बात और नाक में नथ ; आखिर कैसा था नाथूराम गोडसे का बचपन?
नाथूराम विनायक गोडसे की 116वीं जयंती के मौके पर जानिए उसके जीवन, हिंदुत्व विचारधारा से जुड़ाव, विनायक दामोदर सावरकर के प्रभाव, RSS और हिंदू महासभा से संबंध, महात्मा गांधी की हत्या, 1948 के ऐतिहासिक घटनाक्रम, मुकदमे और फांसी तक की पूरी कहानी।

नाथूराम गोडसे
भारत के इतिहास में 30 जनवरी 1948 की तारीख एक ऐसी त्रासदी के रूप में दर्ज है, जिसने पूरे राष्ट्र को झकझोर दिया था। इसी दिन राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या कर दी गई थी, और इस हत्याकांड के केंद्र में था एक नाम नाथूराम विनायक गोडसे। 19 मई 1910 को जन्मे नाथूराम गोडसे की 2026 में 116वीं जयंती मनाई जा रही है। उनके जीवन, विचारधारा और महात्मा गांधी की हत्या तक पहुंचने वाली घटनाओं को लेकर आज भी देश में बहस और विवाद कायम हैं।
नाथूराम गोडसे का जन्म महाराष्ट्र के एक चितपावन ब्राह्मण परिवार में रामचंद्र विनायक गोडसे के रूप में हुआ था। उनके पिता विनायक वामनराव गोडसे डाक विभाग में कर्मचारी थे, जबकि उनकी माता का नाम लक्ष्मी था। परिवार में उनसे पहले जन्मे तीन पुत्र शैशवावस्था में ही मृत्यु का शिकार हो चुके थे। इसी डर और अंधविश्वास के कारण परिवार ने रामचंद्र को शुरुआती वर्षों में लड़की की तरह पाला। उनके नाक में पारंपरिक “नथ” पहनाई गई, जिसके चलते उन्हें “नाथूराम” नाम मिला, जिसका अर्थ था नाक में नथ पहनने वाला राम। बताया जाता है कि बचपन में परिवार को यह भी विश्वास था कि नाथूराम आत्माओं से संवाद कर सकते हैं। किशोरावस्था तक वह कथित रूप से धार्मिक ट्रांस जैसी अवस्थाओं में जाते थे और परिवार की देवी के संदेश सुनाने का दावा करते थे। हालांकि बाद में उन्होंने यह सब छोड़ दिया।
नाथूराम गोडसे ने बारामती में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और बाद में अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई के लिए पुणे भेजे गए। इसी दौरान उनमें राष्ट्रवादी विचार विकसित होने लगे। शुरुआती दिनों में वह ब्रिटिश शासन के खिलाफ महात्मा गांधी के आंदोलनों से प्रभावित भी रहे, लेकिन हाई स्कूल की मैट्रिक परीक्षा में असफल होने के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और बढ़ईगीरी तथा बाद में सिलाई का काम शुरू किया।
उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब उनका परिवार रत्नागिरी चला गया। वहीं उनकी मुलाकात हिंदुत्व विचारधारा के प्रमुख प्रवर्तक विनायक दामोदर सावरकर से हुई। ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का समर्थन करने के आरोप में लंबी सजा भुगत रहे सावरकर उस समय रत्नागिरी में निगरानी के बीच रह रहे थे। गोडसे जल्द ही सावरकर के विचारों से प्रभावित हो गए और हिंदुत्व की उस विचारधारा के समर्थक बन गए, जो भारत को हिंदू बहुल राष्ट्र के रूप में देखती थी।
कुछ समय बाद गोडसे सांगली चले गए, जहां उन्होंने दर्जी के रूप में काम करते हुए अपने राजनीतिक जीवन को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाया। वह हिंदू महासभा से जुड़े और बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सदस्य भी बने। गोडसे को सावरकर का करीबी समर्थक और उनके विचारों का प्रमुख प्रचारक माना जाता था।
देश के विभाजन और 1947 के सांप्रदायिक तनावों के बाद गोडसे की गांधी के प्रति नाराजगी और बढ़ गई। उनका आरोप था कि महात्मा गांधी मुस्लिमों की मांगों के प्रति अधिक नरम रुख अपना रहे हैं। इसी सोच के तहत उन्होंने 1944 में गांधी की हत्या के दो असफल प्रयास किए। अंततः 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली स्थित बिरला हाउस में आयोजित बहुधार्मिक प्रार्थना सभा के दौरान गोडसे ने महात्मा गांधी के सीने में बेहद करीब से तीन गोलियां दाग दीं।
गांधी के गिरते ही वहां मौजूद लोगों में अफरा-तफरी मच गई। इसी दौरान नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास के उप-वाणिज्य दूत हर्बर्ट रेनर जूनियर ने गोडसे को पकड़ लिया और बाद में पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया। जांच में सामने आया कि इस हत्या की साजिश नारायण आप्टे समेत छह अन्य लोगों के साथ मिलकर रची गई थी।
करीब एक वर्ष तक चले ऐतिहासिक मुकदमे के बाद 8 नवंबर 1949 को अदालत ने नाथूराम गोडसे को मृत्युदंड सुनाया। दिलचस्प बात यह रही कि महात्मा गांधी के पुत्र मणिलाल गांधी और रामदास गांधी ने गोडसे के लिए दया याचिका की अपील की थी, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, उपप्रधानमंत्री वल्लभभाई पटेल और गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने इसे स्वीकार नहीं किया। अंततः 15 नवंबर 1949 को अंबाला सेंट्रल जेल में नाथूराम गोडसे को फांसी दे दी गई।
नाथूराम गोडसे का नाम भारतीय इतिहास में हमेशा एक विवादित और संवेदनशील अध्याय के रूप में दर्ज रहेगा। उनकी विचारधारा, महात्मा गांधी की हत्या और उससे जुड़े राजनीतिक प्रभाव आज भी भारतीय राजनीति, इतिहास और समाज में तीखी बहस का विषय बने हुए हैं। गांधी की हत्या ने स्वतंत्र भारत की दिशा और राष्ट्रीय चेतना पर गहरा प्रभाव डाला, जिसकी प्रतिध्वनि दशकों बाद भी महसूस की जाती है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
