भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सन् 1857 का विद्रोह एक ऐसी ज्वाला थी जिसने विदेशी हुकूमत के दंभ को चुनौती दी और इस महायज्ञ के प्रमुख सूत्रधारों में से एक थे नाना साहब पेशवा। 19 मई, 1824 को महाराष्ट्र के वेनगाँव में माधवराव नारायण भट्ट और मैनावती के घर जन्मे धोंडूपंत, जिन्हें दुनिया नाना साहब के नाम से जानती है, पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र थे। पेशवा ने उनकी शिक्षा और सैन्य प्रशिक्षण का उत्तम प्रबंध किया था, जिसके फलस्वरूप वे घुड़सवारी, तलवारबाजी और शस्त्र संचालन में निपुण होने के साथ-साथ कई भाषाओं के ज्ञाता भी बने। नाना साहब का जीवन तब एक निर्णायक मोड़ पर आ गया जब 28 जनवरी, 1851 को बाजीराव पेशवा की मृत्यु हुई और ब्रिटिश कंपनी सरकार ने उनकी उत्तराधिकारिता को चुनौती दी। अंग्रेजों ने उन्हें केवल निजी संपत्ति का वारिस माना, लेकिन पेशवा की पदवी और पेंशन देने से साफ इनकार कर दिया। अपनी न्यायसंगत मांगों के लिए नाना साहब ने लॉर्ड डलहौजी तक गुहार लगाई और अपने विश्वासपात्र वकील अजीमुल्लाह खान को महारानी विक्टोरिया के पास लंदन भेजा, परंतु वहां से भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। अजीमुल्लाह खान ने यूरोप से लौटकर नाना साहब को अंग्रेजों की कमजोरियों और वहां चल रहे स्वतंत्रता आंदोलनों से अवगत कराया, जिसने नाना के मन में विद्रोह की मशाल जला दी।

ब्रिटिश सरकार के इस अपमानजनक व्यवहार ने नाना साहब को एक क्रांति की योजना बनाने पर विवश कर दिया। उन्होंने तीर्थयात्रा के बहाने कालपी, दिल्ली और लखनऊ का दौरा किया और बिहार के कुंवर सिंह जैसे अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर भविष्य के विद्रोह की रूपरेखा तैयार की। जब मेरठ से क्रांति का शंखनाद हुआ, तब कानपुर में नाना साहब ने इसका नेतृत्व संभाला और अपने अदम्य साहस से ब्रिटिश खजाने और शस्त्रागार पर अधिकार कर लिया। उनके रणनीतिक कौशल का प्रमाण तब मिला जब उन्होंने क्रांतिकारियों को दिल्ली जाने से रोककर कानपुर में ही युद्ध का मोर्चा खोलने का निर्णय लिया। कल्याणपुर से उन्होंने औपचारिक रूप से युद्ध की घोषणा की और अपनी सेना को विभिन्न टुकड़ियों में विभाजित कर अंग्रेजों को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया। सतीचौरा घाट की हिंसक घटना को लेकर ब्रिटिश इतिहासकारों ने उन पर कई आरोप लगाए, परंतु इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता कि वे उस नरसंहार के प्रत्यक्ष दोषी थे। कानपुर पर अंग्रेजों के पुनः नियंत्रण के बाद नाना साहब ने अमोघ साहस का परिचय देते हुए लखनऊ और रोहिलखंड में विद्रोह की कमान संभाली। उन्होंने खान बहादुर खान के साथ मिलकर ब्रिटिश सेना को कड़ी चुनौती दी और अंत समय तक उनके हाथ नहीं आए।

अंग्रेजों ने नाना साहब को बंदी बनाने के लिए भारी पुरस्कारों की घोषणा की, लेकिन वे कभी पकड़े नहीं जा सके। माना जाता है कि अपने जीवन के अंतिम दौर में उन्होंने नेपाल की तराई में शरण ली थी, जहाँ 1859 के आसपास उनकी मृत्यु के दावे किए जाते हैं, हालाँकि कुछ लोग उन्हें सीहोर से भी जोड़कर देखते हैं। नाना साहब केवल एक बागी सेनापति नहीं थे, बल्कि वे भारतीय स्वाधीनता की उस अटूट इच्छाशक्ति के प्रतीक थे जिसने भविष्य की पीढ़ियों के लिए राष्ट्रभक्ति का मार्ग प्रशस्त किया। उनका जीवन संघर्ष, कूटनीतिक सूझबूझ और मातृभूमि के प्रति समर्पण उन्हें भारतीय इतिहास के पन्नों में एक अमर नायक के रूप में स्थापित करता है, जिनका बलिदान आज भी प्रत्येक भारतीय को गौरवान्वित करता है।

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