कौन थीं नगेंद्र बाला? देश की पहली जिला प्रमुख और महिला सशक्तिकरण की प्रखर आवाज
स्वतंत्रता सेनानी केसरी सिंह बारहट की पौत्री नगेंद्र बाला ने कोटा की पहली जिला प्रमुख और दो बार विधायक बनकर महिला सशक्तिकरण की नई इबारत लिखी थी।

हाड़ौती की धरा से उपजी एक ऐसी क्रांतिकारी चेतना, जिसने न केवल स्वतंत्रता संग्राम में आहुति दी, बल्कि आजाद भारत में पंचायती राज की पहली महिला ध्वजवाहक बनकर इतिहास रच दिया।
राजस्थान के क्रांतिकारी इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज नगेंद्र बाला का जन्म 13 सितंबर, 1926 को एक ऐसे परिवार में हुआ था जहाँ राष्ट्रभक्ति रगों में दौड़ती थी। महान क्रांतिकारी केसरी सिंह बारहट की पौत्री और अमर शहीद प्रताप सिंह बारहट की भतीजी होने के नाते जनसेवा और राजनीति के संस्कार उन्हें विरासत में मिले थे। किशोरावस्था से ही सार्वजनिक सेवा और महिला उत्थान के प्रति उनके भीतर एक अटूट संकल्प था, जिसने उन्हें 1941 से 1945 के बीच चले किसान आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया। हाड़ौती क्षेत्र में महिलाओं के भीतर राष्ट्रीय चेतना जगाने का श्रेय निर्विवाद रूप से उन्हें ही जाता है। 1942 के स्वतंत्रता आंदोलन में उन्होंने अदम्य साहस का परिचय दिया और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के निधन के पश्चात उनके अस्थि कलश को दिल्ली से कोटा लाकर चंबल नदी में विसर्जित करने का पुनीत कार्य भी उन्हीं के हाथों संपन्न हुआ।
आजादी के बाद जब देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं का ढांचा खड़ा हो रहा था, तब 1960 में नगेंद्र बाला ने कोटा की प्रथम जिला प्रमुख बनकर पूरे देश को अचंभित कर दिया। वे भारत की पहली महिला जिला प्रमुख थीं, जिन्होंने इस पद की गरिमा को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया। उनका राजनीतिक सफर यहीं नहीं रुका, बल्कि उन्होंने 1962 से 1967 तक छबड़ा-शाहबाद और 1972 से 1977 तक दीगोद विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए दो बार विधायक के रूप में जनता की सेवा की। राजनीति के साथ-साथ समाज कल्याण उनकी प्राथमिकता बनी रही, जिसके चलते उन्होंने 1982 से 1988 तक समाज कल्याण बोर्ड की अध्यक्ष और बाद में राज्य महिला आयोग की सदस्य के रूप में महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई लड़ी। विनोबा भावे के साथ पदयात्रा करने वाली इस जुझारू व्यक्तित्व ने कोटा में 'करणी नगर विकास समिति' की स्थापना के लिए अपने परिवार की भूमि तक दान कर दी, जो उनके त्याग और समर्पण का जीवंत प्रमाण है।
नगेंद्र बाला का जीवन केवल पदों और उपलब्धियों का संग्रह नहीं था, बल्कि वह पितृसत्तात्मक समाज में महिला नेतृत्व की स्वीकार्यता का एक सफल प्रयोग था। सितंबर 2010 में 84 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ, लेकिन उनके द्वारा बोए गए महिला सशक्तिकरण और स्वावलंबन के बीज आज भी राजस्थान की राजनीति और समाज में वटवृक्ष बनकर खड़े हैं। उनका व्यक्तित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संदेश देता है कि यदि इरादे फौलादी हों और विरासत में मिले मूल्यों के प्रति निष्ठा अटूट हो, तो एक महिला राष्ट्र की मुख्यधारा में बदलाव की सबसे बड़ी वाहक बन सकती है।

