भारतीय इतिहास की विशाल और विविधतापूर्ण पृष्ठभूमि में कुछ ऐसे समुदायों का उदय हुआ जिन्होंने न केवल देश की आर्थिक रीढ़ को मजबूत किया, बल्कि अपनी अद्वितीय सांस्कृतिक चेतना से समाज को एक नई दिशा भी दी। दक्षिण भारत के तमिलनाडु प्रांत से ताल्लुक रखने वाला 'नगरथार' समुदाय एक ऐसा ही अप्रतिम नाम है, जिसका शाब्दिक अर्थ 'नगर-निवासी' होता है। अपने पारंपरिक गढ़ चेट्टिनाड क्षेत्र के कारण 'चेट्टियार' और बड़े किलेनुमा हवेलियों में रहने के कारण 'नाट्टुकोट्टई चेट्टियार' के नाम से विख्यात यह समाज मूलतः एक समृद्ध व्यापारिक, बैंकिंग और ज़मीनदार समुदाय रहा है। भारतीय इतिहास और जनमानस में नगरथार समुदाय आज भी अपनी असाधारण परोपकारिता, विशाल शिव एवं विष्णु मंदिरों के जीर्णोद्धार, शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और एक अद्वितीय बैंकिंग प्रणाली के जनक के रूप में पूरे सम्मान के साथ याद किया जाता है।

इस गौरवशाली समुदाय की ऐतिहासिक यात्रा प्राचीन कालखंड की गहराइयों से शुरू होती है। पौराणिक और ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार नगरथार समुदाय के पूर्वज मूल रूप से कांचीपुरम के उत्तर या उत्तर-पश्चिम में स्थित प्राचीन 'नागनाडू' के निवासी थे, जो किसी भीषण भूकंप या बाढ़ के कारण नष्ट हो गया था। ईसा पूर्व 2897 से लगभग 2100 वर्षों तक तोंदै नाडु (कांचीपुरम) में रहने के बाद, इस समुदाय ने चोल साम्राज्य की तत्कालीन राजधानी कावेरीपूमपट्टिनम (पूंपुहार) की ओर प्रस्थान किया, जहाँ वे ईसा पूर्व 789 से करीब 1400 वर्षों तक फले-फूले। बाद में, चोल राजा पूवंधी चोलन के कथित उत्पीड़न अथवा समुद्र की निकटता के कारण पूंपुहार के जलमग्न होने पर, इस समुदाय ने पांड्य राजा के आमंत्रण पर वर्ष 707 ईस्वी के आसपास पांड्य साम्राज्य (आधुनिक करैकूडी और चेट्टिनाड क्षेत्र) की ओर रुख किया। इन प्रवासों के दौरान समुद्र में रास्ता भटकने और 21 दिनों की कठिन प्रार्थना के बाद सुरक्षित तट पर पहुँचने की स्मृति में यह समुदाय आज भी 'पिल्लैयार नोनबू' त्योहार बेहद श्रद्धा से मनाता है।

आर्थिक और सामाजिक संरचना की दृष्टि से दक्षिण भारत की चतुर्वर्ण व्यवस्था के अभाव में नगरथार समुदाय को उनकी प्रखर व्यावसायिक समझ के कारण उच्च वर्गीय 'वैश्य' का स्थान दिया गया। मध्यकाल में नमक के व्यापारी के रूप में शुरुआत करने वाले नाट्टुकोट्टई चेट्टियारों ने 8वीं शताब्दी तक आते-आते समुद्री व्यापार में महारत हासिल कर ली थी। 17वीं और 18वीं शताब्दी में जब यूरोपीय शक्तियों का दक्षिण-पूर्व एशिया में विस्तार हुआ, तब नगरथार समुदाय ने इस परिस्थिति का लाभ उठाकर कपास, चावल और ऋण देने के व्यवसाय को एक विशाल साम्राज्य में बदल दिया। 19वीं शताब्दी तक आते-आते उन्होंने एक बेहद परिष्कृत और आधुनिक बैंकिंग प्रणाली का विकास कर लिया, जिसका विस्तार भारत की सीमाओं को लांघकर श्रीलंका, म्यांमार, मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया और वियतनाम जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों तक हो गया। उनकी आर्थिक संपन्नता इस कदर बढ़ गई थी कि 19वीं सदी के ज़मीनदार कानूनी लड़ाइयों के लिए इनसे कर्ज़ लेते थे और समय पर भुगतान न होने पर ये ज़मींदारियाँ नगरथार समुदाय के अधीन आ जाती थीं। धन और प्रभाव के इसी चरम उत्कर्ष के कारण इस समुदाय के कई कुलीन व्यक्तियों ने राजा की उपाधि और क्षत्रिय-तुल्य सत्ता भी प्राप्त की।

नगरथार समुदाय की सामाजिक ताने-बाने की सबसे बड़ी विशेषता उनका 'नौ मंदिरों' (इलायथंगुडी, इलुप्पैकूडी, इरानियूर, मथुर, नेमम, पिल्लैयारपट्टी, सूराकूडी, वैरवन और वेलंगुडी) से जुड़ाव है, जिन्हें 8वीं शताब्दी में स्थापित किया गया था। यह पूरा समुदाय इन नौ मंदिरों के आधार पर विभिन्न कुलों में विभाजित है, जहाँ एक ही मंदिर से जुड़े परिवारों (पंगाली) के बीच विवाह पूर्णतः वर्जित होता है। अपनी अकूत संपत्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस समुदाय ने सामाजिक और धार्मिक उत्थान में लगाया। उन्होंने न केवल चेट्टिनाड में वास्तुकला के बेजोड़ नमूने के रूप में विशाल हवेलियों का निर्माण कराया, बल्कि तमिलनाडु सहित देश-विदेश के अनगिनत शिव और विष्णु मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया और छतरियों, सराय, स्कूलों तथा विश्वविद्यालयों की स्थापना की। चेट्टिनाड की अनूठी पाक शैली (चेट्टिनाड क्यूजीन) भी इसी समृद्ध संस्कृति की देन है जो आज वैश्विक स्तर पर सराही जाती है।

इस समुदाय ने भारतीय इतिहास, साहित्य, सिनेमा और उद्योग जगत को ऐसी महान विभूतियाँ दी हैं जिनका योगदान अमिट है। शील और पवित्रता की प्रतीक देवी कण्णगी, प्रसिद्ध नयनार संत इयरपगई नयनार और मूर्ति नयनार, 10वीं-14वीं सदी के महान दार्शनिक संत पट्टिनथार, और शिवभक्त कवयित्री करैक्काल अम्मैयार इसी परंपरा से आते हैं। आधुनिक भारत के निर्माण में राजा सर अन्नामलाई चेट्टियार (अन्नामलाई विश्वविद्यालय के संस्थापक), प्रख्यात उद्योगपति और परोपकारी अलगप्पा चेट्टियार, भारतीय चमड़ा उद्योग के प्रणेता ए. नागप्पा चेट्टियार, मुरुगप्पा ग्रुप के संस्थापक ए. एम. मुरुगप्पा चेट्टियार, एवीएम प्रोडक्शंस के संस्थापक और तमिल सिनेमा के भीष्म पितामह ए. वी. मेयप्पन, कालजयी कवि व गीतकार कन्नादासन और तमिल बाल साहित्य के पुरोधा अझा वल्लियप्पा जैसी हस्तियों ने नगरथार समुदाय के गौरव को अमर बना दिया है।

Pratahkal HQ

Pratahkal HQ

Next Story