दिल्ली सल्तनत के इतिहास में Muhammad bin Tughluq का नाम एक ऐसे शासक के रूप में दर्ज है, जिसकी प्रतिभा, महत्वाकांक्षा और निर्णयों ने उसे इतिहास का सबसे विवादास्पद सुल्तान बना दिया। कुछ इतिहासकारों ने उसे अपने समय का अत्यंत विद्वान और दूरदर्शी शासक बताया, तो कुछ ने उसे “सनकी बादशाह” और “बुद्धिमान मूर्ख” जैसी उपाधियों से संबोधित किया। उसकी नीतियाँ जितनी साहसिक थीं, उतनी ही विनाशकारी भी सिद्ध हुईं। फिर भी यह निर्विवाद है कि मुहम्मद बिन तुगलक का शासनकाल मध्यकालीन भारत के राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक इतिहास में गहरी छाप छोड़ गया।

सन 1290 के आसपास जन्मे मुहम्मद बिन तुगलक का वास्तविक नाम जौना खान था। वह Ghiyath al-Din Tughluq का सबसे बड़ा पुत्र था, जिसने तुगलक वंश की स्थापना की थी। बचपन से ही जौना खान असाधारण बुद्धिमत्ता और अध्ययनशील प्रवृत्ति के लिए प्रसिद्ध था। उसे फारसी, अरबी, संस्कृत, तुर्की और हिंदवी भाषाओं का ज्ञान था। वह दर्शन, गणित, चिकित्सा और धर्म जैसे विषयों में गहरी रुचि रखता था। प्रसिद्ध मोरक्को यात्री Ibn Battuta ने अपने यात्रा-वृत्तांत में उसके ज्ञान, वाक्पटुता और विद्वत्ता की प्रशंसा की है। हालांकि उसकी प्रवृत्ति अत्यधिक आत्मविश्वासी और कठोर मानी जाती थी, जिसके कारण वह प्रायः दूसरों की सलाह को महत्व नहीं देता था।

युवावस्था में ही उसे सैन्य अभियानों की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी। वर्ष 1321 में उसके पिता ने उसे दक्कन क्षेत्र में स्थित काकतीय वंश के विरुद्ध अभियान पर भेजा। जौना खान ने 1323 में वारंगल पर सफलतापूर्वक कब्जा कर लिया और काकतीय साम्राज्य का अंत कर दिया। इस विजय ने उसे एक सक्षम सेनानायक के रूप में स्थापित कर दिया। पिता की मृत्यु के तीन दिन बाद, 4 फरवरी 1325 को वह दिल्ली सल्तनत के सिंहासन पर बैठा और मुहम्मद बिन तुगलक के नाम से शासन करने लगा।

सत्ता संभालने के बाद उसने अपने साम्राज्य का विस्तार दक्षिण भारत तक किया। वारंगल, माबर, मदुरै और कर्नाटक के कई क्षेत्रों को उसने सल्तनत में शामिल किया। प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए उसने नए राजस्व अधिकारियों की नियुक्ति की और आर्थिक लेखा-जोखा को व्यवस्थित करने का प्रयास किया। वह धार्मिक मामलों में भी अपेक्षाकृत उदार माना जाता है। कई ऐतिहासिक उल्लेख बताते हैं कि उसने जैन विद्वानों का सम्मान किया और हिंदू उत्सवों में भी भाग लिया। यही कारण है कि कुछ इतिहासकार उसे दिल्ली सल्तनत का सबसे सहिष्णु सुल्तान मानते हैं।

मुहम्मद बिन तुगलक का सबसे चर्चित और विवादास्पद निर्णय राजधानी को दिल्ली से दौलताबाद स्थानांतरित करना था। वर्ष 1327 में उसने यह आदेश दिया कि सल्तनत की राजधानी दिल्ली से हटाकर दक्कन क्षेत्र के दौलताबाद में स्थापित की जाए। उसके पीछे तर्क यह था कि दौलताबाद उत्तर और दक्षिण भारत के बीच अधिक केंद्रीय स्थिति में था, जिससे पूरे साम्राज्य का बेहतर प्रशासन संभव हो सके। इसके अतिरिक्त वह मंगोल और अफगान आक्रमणों से दिल्ली को सुरक्षित रखना चाहता था। राजधानी परिवर्तन के लिए विशाल सड़कें बनवाई गईं, मार्गों पर पेड़ लगाए गए और विश्राम स्थलों की व्यवस्था की गई, लेकिन इतनी बड़ी जनसंख्या के विस्थापन के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं थे। परिणामस्वरूप यात्रा के दौरान भूख, प्यास और थकान से हजारों लोगों की मृत्यु हो गई। अंततः बढ़ते विद्रोहों और प्रशासनिक कठिनाइयों के कारण 1335 में उसे राजधानी पुनः दिल्ली वापस लानी पड़ी। यह निर्णय उसकी प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुंचाने वाला साबित हुआ।

उसकी दूसरी बड़ी और विफल मानी जाने वाली नीति टोकन मुद्रा की शुरुआत थी। वर्ष 1330 के आसपास उसने तांबे और पीतल के सिक्कों को चांदी और सोने के सिक्कों के बराबर मूल्य देने की घोषणा की। यह प्रयोग चीन की मुद्रा प्रणाली से प्रेरित था और उसका उद्देश्य विशाल सैन्य अभियानों तथा प्रशासनिक खर्चों को पूरा करना था। लेकिन सिक्कों की ढलाई पर प्रभावी नियंत्रण न होने के कारण लोगों ने घरों में नकली सिक्के बनाना शुरू कर दिया। देखते ही देखते बाजार नकली मुद्रा से भर गया और व्यापारिक व्यवस्था चरमरा गई। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि सरकार को अंततः इस योजना को वापस लेना पड़ा। इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी ने इस नीति को मुहम्मद बिन तुगलक की जल्दबाजी और अव्यावहारिक सोच का उदाहरण बताया है।

मुहम्मद बिन तुगलक अत्यंत महत्वाकांक्षी शासक था। उसने मध्य एशिया और खुरासान तक अपने साम्राज्य का विस्तार करने की योजना बनाई और इसके लिए विशाल सेना तैयार की। कहा जाता है कि उसने लगभग 3 लाख 70 हजार सैनिकों की भर्ती की और उन्हें एक वर्ष का अग्रिम वेतन भी दिया। लेकिन अभियान शुरू होने से पहले ही आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया और सेना को भंग करना पड़ा। इसी प्रकार हिमालय पार कर चीन की ओर बढ़ने की उसकी योजना भी विफल रही। कुमाऊँ क्षेत्र में स्थानीय राजपूतों के प्रतिरोध के कारण उसकी सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

उसके शासनकाल में लगातार विद्रोह भी होते रहे। बंगाल, माबर और दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। इसी दौरान हरिहर और बुक्का ने दक्षिण भारत में Vijayanagara Empire की स्थापना की, जबकि दक्कन में हसन गंगू ने आगे चलकर Bahmani Sultanate की नींव रखी। दूसरी ओर मेवाड़ के Hammir Singh ने राजपूताना में दिल्ली सल्तनत की शक्ति को चुनौती दी। इन घटनाओं ने सल्तनत की केंद्रीय सत्ता को कमजोर कर दिया और साम्राज्य धीरे-धीरे विघटन की ओर बढ़ने लगा।

मुहम्मद बिन तुगलक का व्यक्तित्व जितना विद्वत्तापूर्ण था, उतना ही कठोर और रहस्यमय भी माना जाता है। वह नियमित रूप से नमाज पढ़ता और रमजान के रोजे रखता था। साथ ही वह दर्शन, विज्ञान और साहित्य का संरक्षक भी था। कहा जाता है कि वह फारसी कविता का उत्कृष्ट ज्ञाता और तर्कशास्त्र का कुशल विद्यार्थी था। उसने सूफी संतों का सम्मान किया और Nizamuddin Dargah से जुड़े निर्माण कार्यों में भी रुचि दिखाई। लेकिन दूसरी ओर उसकी कठोर सजाओं और आवेगपूर्ण फैसलों ने उसे जनता और अमीरों के बीच अलोकप्रिय बना दिया।

20 मार्च 1351 को सिंध के ठट्टा क्षेत्र में विद्रोह दबाने के अभियान के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। उसके निधन के समय तक दिल्ली सल्तनत का बड़ा हिस्सा उससे अलग हो चुका था। फिर भी इतिहास में मुहम्मद बिन तुगलक को केवल असफलताओं के आधार पर नहीं देखा जाता। उसकी कई योजनाएँ अपने समय से आगे थीं, लेकिन उचित तैयारी और व्यावहारिक क्रियान्वयन के अभाव में वे विफल हो गईं। उसने प्रशासनिक सुधार, आर्थिक प्रयोग और साम्राज्य विस्तार के माध्यम से एक नए प्रकार की शासन व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास किया। यही कारण है कि इतिहासकार आज भी उसे मध्यकालीन भारत का सबसे जटिल, प्रतिभाशाली और विरोधाभासी शासक मानते हैं।

Pratahkal HQ

Pratahkal HQ

Next Story