राजस्थान की मरुधरा को सामंती बेड़ियों से मुक्त कर आधुनिक प्रगति की राह पर अग्रसर करने वाले मोहनलाल सुक्खड़िया भारतीय राजनीति के वे चमकते सितारे थे, जिन्होंने करीब सत्रह वर्षों तक मुख्यमंत्री के रूप में राज्य की नियति को एक नया आकार दिया।

31 जुलाई, 1916 को झालावाड़ में जन्मे मोहनलाल सुक्खड़िया का व्यक्तित्व बचपन से ही असाधारण प्रतिभा और प्रगतिशील सोच का संगम था। उनके पिता पुरुषोत्तमलाल सुक्खड़िया एक प्रख्यात क्रिकेटर थे, जिन्होंने मुंबई और सौराष्ट्र के लिए अपनी खेल प्रतिभा का लोहा मनवाया था। सुक्खड़िया की प्रारंभिक शिक्षा नाथद्वारा और उदयपुर में हुई, जिसके बाद वे विद्युत अभियांत्रिकी में डिप्लोमा के लिए मुंबई के वीजेटीआई संस्थान चले गए। मुंबई के इसी छात्र जीवन ने उनके भीतर राजनीतिक चेतना का संचार किया, जहाँ वे छात्र संघ के महासचिव चुने गए और सुभाष चंद्र बोस, सरदार वल्लभभाई पटेल, यूसुफ मेहरअली तथा अशोक मेहता जैसे दिग्गज राष्ट्रीय नायकों के संपर्क में आए। अपनी शिक्षा पूर्ण कर जब वे वापस राजस्थान लौटे, तो उन्होंने नाथद्वारा में एक छोटी सी बिजली की दुकान से अपने पेशेवर सफर की शुरुआत की, लेकिन यह दुकान केवल व्यवसाय का केंद्र नहीं बल्कि सामाजिक-आर्थिक सुधारों और ब्रिटिश कुशासन के खिलाफ रणनीति बनाने का मुख्य अड्डा बन गई।

सुक्खड़िया केवल राजनीति में ही नहीं, बल्कि सामाजिक सुधारों में भी क्रांतिकारी थे। उन्होंने 1 जून, 1938 को इंदुबाला सुक्खड़िया के साथ अंतर्जातीय विवाह कर तत्कालीन रूढ़िवादी समाज की नींव हिला दी थी। इस साहसी निर्णय के कारण उन्हें अपने ही परिवार और नाथद्वारा के कट्टरपंथी समाज के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। यहाँ तक कि उनकी माँ, जो श्रीनाथजी की भक्ति और छुआछूत की परंपराओं के बीच पली-बढ़ी थीं, ने भी प्रारंभ में उन्हें अपनाने से इनकार कर दिया था। इसके बावजूद, सुक्खड़िया डगमगाए नहीं और अपने मित्रों के सहयोग से नाथद्वारा में अपनी दुल्हन के साथ एक जुलूस निकाला, जो उनके जीवन की सबसे बड़ी जीत और सामाजिक बदलाव का प्रतीक बना। बाद में उनके इसी संकल्प ने समाज को प्रभावित किया और अंततः उन्हें अपनी माँ का आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ।

मेवाड़ प्रजामंडल के माध्यम से सक्रिय राजनीति में कदम रखने वाले सुक्खड़िया ने लगातार 10 बार विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी अजेय लोकप्रियता को सिद्ध किया। मात्र 38 वर्ष की आयु में 1954 में मुख्यमंत्री का पद संभालने वाले सुक्खड़िया ने 1971 तक राजस्थान की कमान संभाली। उनके इस कार्यकाल को राजस्थान का स्वर्ण युग कहा जाता है, जिसमें उन्होंने शिक्षा, सड़क, बिजली और जल प्रबंधन जैसे बुनियादी ढांचे को मजबूत कर एक पिछड़े राज्य को विकासशील प्रदेश में तब्दील कर दिया। मुख्यमंत्री पद से मुक्त होने के बाद उन्होंने कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के राज्यपाल के रूप में भी अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया। 2 फरवरी, 1982 को बीकानेर में इस महान जननायक ने अंतिम सांस ली, लेकिन उनके द्वारा रोपित आधुनिक विकास के बीज आज भी राजस्थान को वटवृक्ष बनकर छाया दे रहे हैं।

मोहनलाल सुक्खड़िया का योगदान केवल आंकड़ों या वर्षों तक सीमित नहीं है, बल्कि वे एक ऐसी दूरदर्शी सोच के प्रणेता थे जिसने जातिवाद और छुआछूत जैसी कुरीतियों के विरुद्ध खड़े होकर एक समतावादी समाज की कल्पना की थी। आधुनिक राजस्थान का हर कोना आज भी उनके नेतृत्व और विकासवादी दृष्टि की गवाही देता है, जो उन्हें इतिहास के पन्नों में सदा के लिए 'आधुनिक राजस्थान का निर्माता' बनाता है।

Pratahkal HQ

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