कौन थे जैत्र सिंह? मेवाड़ के वो प्रतापी शासक जिन्होंने इल्तुतमिश को धूल चटाकर चित्तौड़ को बनाया अपनी शक्ति का केंद्र
जैत्र सिंह ने 1227 में भूतला के युद्ध में दिल्ली सुल्तान इल्तुतमिश को पराजित किया और सुरक्षा कारणों से नागदा के स्थान पर चित्तौड़गढ़ को मेवाड़ की नई राजधानी बनाया।

मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास में महाराणा जैत्र सिंह एक ऐसे प्रकाश स्तंभ के रूप में उभरते हैं, जिन्होंने न केवल बाहरी आक्रमणकारियों से अपनी मातृभूमि की रक्षा की, बल्कि मध्यकालीन मेवाड़ के स्वर्णिम युग की नींव भी रखी।
सन 1213 ईस्वी में पिता पद्म सिंह के उत्तराधिकारी के रूप में मेवाड़ की गद्दी पर बैठने वाले जैत्र सिंह का शासनकाल अदम्य साहस और कूटनीतिक दूरदर्शिता का संगम था। उन्होंने अपने शासन के शुरुआती दौर में ही अपनी सैन्य कुशलता का परिचय देते हुए मौर्यों को पराजित किया और चित्तौड़ पर विजय प्राप्त कर उसे मेवाड़ के साम्राज्य में मिला लिया। जैत्र सिंह के काल की सबसे बड़ी सैन्य उपलब्धि दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश के विरुद्ध मिली जीत मानी जाती है। इल्तुतमिश मेवाड़ को अपने साम्राज्य का हिस्सा बनाना चाहता था, जिसके परिणामस्वरूप सन 1227 ईस्वी में नागदा के समीप 'भूतला का युद्ध' लड़ा गया। इस भीषण संग्राम में जैत्र सिंह के शौर्य के सामने सुल्तान की सेना टिक न सकी और उसे पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा। हालांकि जैत्र सिंह इस युद्ध में विजयी रहे, लेकिन पीछे हटती तुर्क सेना ने मेवाड़ की तत्कालीन राजधानी नागदा को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया। इस विनाश को देखते हुए जैत्र सिंह ने एक रणनीतिक फैसला लिया और नागदा तथा आहड़ के स्थान पर सामरिक दृष्टि से सुरक्षित चित्तौड़गढ़ को मेवाड़ की नई राजधानी घोषित कर दिया, जिससे आगे चलकर चित्तौड़ वीरता का वैश्विक प्रतीक बना।
जैत्र सिंह का शासनकाल केवल आंतरिक सुदृढ़ीकरण तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने चालुक्यों के प्रभाव से आहड़ को मुक्त कराकर मेवाड़ के सम्मान को पुनर्स्थापित किया। उनके समय में ही सन 1223 ईस्वी के आसपास मंगोल आक्रमणकारी चंगेज खान का भारत की ओर रुख हुआ, जिससे उत्तर भारत में भय का माहौल था, किंतु जैत्र सिंह ने अपनी सीमाओं की रक्षा पूरी तत्परता से की। उनके पराक्रम का उल्लेख जय सिंह सूरी द्वारा रचित ग्रंथ 'हम्मीर मदमर्दन' में विस्तार से मिलता है, जो उनके शासनकाल की वीरता की गवाही देता है। सन 1248 ईस्वी में इल्तुतमिश के उत्तराधिकारी सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद ने भी मेवाड़ पर आक्रमण करने का दुस्साहस किया, लेकिन जैत्र सिंह की कुशल सैन्य रणनीति ने उसे भी बुरी तरह पराजित कर वापस लौटने पर विवश कर दिया। लगातार होने वाले विदेशी आक्रमणों के बावजूद जैत्र सिंह ने मेवाड़ की प्रशासनिक और सैन्य शक्ति को कमजोर नहीं होने दिया, बल्कि उसे एक नई ऊंचाई प्रदान की।
इतिहासकार डॉ. दशरथ शर्मा ने जैत्र सिंह के शासनकाल को 'मध्यकालीन मेवाड़ का स्वर्ण युग' कहकर संबोधित किया है, जो उनकी प्रशासनिक दक्षता और वीरता का सबसे बड़ा प्रमाण है। सन 1253 ईस्वी तक शासन करने के बाद उन्होंने अपनी विरासत अपने पुत्र तेज सिंह को सौंपी। जैत्र सिंह का व्यक्तित्व एक ऐसे दूरदर्शी शासक का था जिसने बिखरते हुए राज्य को न केवल संजोया, बल्कि उसे दिल्ली सल्तनत के समानांतर एक शक्तिशाली स्वायत्त राज्य के रूप में स्थापित किया। उनका त्याग, चित्तौड़ का चयन और विदेशी शत्रुओं पर निरंतर विजय उन्हें भारतीय इतिहास के महानतम योद्धाओं की श्रेणी में खड़ा करती है, जिनका नाम आज भी मेवाड़ की मिट्टी में गूंजता है।

