आज भी मानव सभ्यता के विकास की उस निर्णायक कड़ी के रूप में मेसोलिथिक काल को स्मरण किया जाता है, जिसने पुरापाषाण युग की कठोर शिकारी जीवन-शैली से नवपाषाण युग की कृषि आधारित स्थायी सभ्यता की ओर संक्रमण की नींव रखी। लगभग 15,000 से 5,000 वर्ष पूर्व यूरोप में और पश्चिम एशिया में 20,000 से 10,000 वर्ष पूर्व तक फैला यह काल अंतिम हिमयुग के अंत और होलोसीन युग की गर्म जलवायु के आरंभ के बीच एक परिवर्तनकारी ऐतिहासिक चरण के रूप में स्थापित हुआ, जिसे मानव इतिहास में “मध्य पाषाण युग” कहा जाता है।

इस कालखंड की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि मानव अब बड़े जानवरों के समूह शिकार पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहा, बल्कि उसने विविध प्रकार के संसाधनों पर आधारित व्यापक भोजन-संग्रह प्रणाली अपनाई। नदियों, झीलों और समुद्री तटों के निकट बसने की प्रवृत्ति बढ़ी, जिससे अपेक्षाकृत स्थायी बस्तियों के संकेत मिलते हैं। इसी समय छोटे और अधिक परिष्कृत पत्थर के औजारों, जिन्हें माइक्रोलिथ कहा जाता है, का विकास हुआ, जिन्होंने मानव की तकनीकी दक्षता को एक नई दिशा प्रदान की और हथियारों व उपकरणों के निर्माण में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया।

मेसोलिथिक समाजों की सामाजिक संरचना अपेक्षाकृत सरल मानी जाती है, किंतु यह युग सांस्कृतिक परिवर्तन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। इस काल में कुछ क्षेत्रों में प्रारंभिक मिट्टी के बर्तनों और वस्त्र निर्माण के प्रमाण भी मिलते हैं, जबकि कृषि अभी पूर्ण रूप से विकसित नहीं हुई थी। दफन परंपराएँ भी साधारण थीं, जो यह दर्शाती हैं कि सामाजिक जटिलता अभी नवपाषाण युग की तुलना में सीमित स्तर पर थी। इसके बावजूद मानव समूहों में सहयोग, संसाधन-साझेदारी और पर्यावरणीय अनुकूलन की क्षमता स्पष्ट रूप से विकसित हो रही थी।

यूरोप और निकट पूर्व के पुरातात्विक अभिलेख बताते हैं कि इस काल में मानव ने जलवायु परिवर्तन के साथ गहरा सामंजस्य स्थापित किया। उत्तरी यूरोप में दलदली और वन क्षेत्रों के विस्तार ने नए प्रकार के खाद्य संसाधनों को जन्म दिया, जिससे मैग्लेमोसियन और अन्य क्षेत्रीय संस्कृतियों का विकास हुआ। इसी काल में कला और प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति भी एक नए रूप में सामने आई, जिसमें खुले स्थानों पर शैलचित्र, मानव आकृतियों का चित्रण, नृत्य और शिकार के दृश्य प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं, जो पहले के गुफा-चित्रों से भिन्न एक सामाजिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं।

मेसोलिथिक काल को केवल एक मध्य चरण नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के “संक्रमण युग” के रूप में देखा जाता है, जिसमें शिकारी-संग्राहक जीवन से कृषि आधारित समाज की ओर धीरे-धीरे लेकिन निर्णायक परिवर्तन हुआ। यही वह ऐतिहासिक मोड़ था जिसने मानव को प्रकृति के साथ अधिक नियंत्रित और स्थायी संबंध स्थापित करने की दिशा में अग्रसर किया तथा आगे चलकर नवपाषाण क्रांति की आधारभूमि तैयार की, जिसने विश्व सभ्यता की दिशा ही बदल दी।

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