कौन थे अबुल कलाम आजाद? भारतीय शिक्षा की नींव रखने वाले वह दूरदर्शी महानायक जिन्होंने राष्ट्र को दी 'आजाद' पहचान।
स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री और भारत रत्न मौलाना आजाद का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, शिक्षा प्रणाली के विस्तार और हिंदू-मुस्लिम एकता में ऐतिहासिक योगदान।

मक्का की पवित्र धरती पर 11 नवंबर 1888 को जन्मे अबुल कलाम गुलाम मुहीउद्दीन, जिन्हें दुनिया 'मौलाना आजाद' के नाम से जानती है, आधुनिक भारत के उन निर्माताओं में से एक थे जिन्होंने अपनी कलम और बौद्धिक क्षमता से ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी। एक विद्वान परिवार में जन्मे आजाद की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई, जहाँ उन्होंने अरबी, फारसी, दर्शन और गणित जैसे विषयों में इतनी कम उम्र में महारत हासिल कर ली कि मात्र पंद्रह वर्ष की आयु में वे स्वयं से दोगुनी उम्र के छात्रों को पढ़ाने लगे थे। 1890 में कलकत्ता आकर बसे आजाद ने बचपन से ही पत्रकारिता और साहित्य के माध्यम से सामाजिक चेतना जगाने का कार्य शुरू किया और 'अल-हिलाल' जैसे पत्रों के जरिए भारतीय मुसलमानों को राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा से जोड़ते हुए हिंदू-मुस्लिम एकता का शंखनाद किया। उनकी इसी प्रखर राष्ट्रवादी सोच के कारण ब्रिटिश सरकार ने कई बार उनके पत्रों पर प्रतिबंध लगाया और उन्हें नजरबंद भी किया, लेकिन उनकी वैचारिक स्वतंत्रता को कोई कैद न कर सका।
स्वातंत्र्य संग्राम के दौरान वे महात्मा गांधी के विचारों से गहरे प्रभावित हुए और खिलाफत आंदोलन के साथ-साथ असहयोग आंदोलन में भी अग्रणी भूमिका निभाई, जिसके चलते 1923 में मात्र 35 वर्ष की आयु में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष बने। मौलाना आजाद केवल एक राजनीतिज्ञ नहीं बल्कि एक महान शिक्षाविद् भी थे, जिन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान दिया और धर्मनिरपेक्षता व समाजवाद के सिद्धांतों को राष्ट्र के मूल स्वरूप में पिरोने का प्रयास किया। 1940 से 1945 के बीच कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उन्होंने 'भारत छोड़ो आंदोलन' का नेतृत्व किया और विभाजन की विभीषिका के विरुद्ध डटकर खड़े रहे, क्योंकि उनका मानना था कि भारत की राष्ट्रीयता एक अटूट इकाई है जिसमें इस्लाम का भी उतना ही दावा है जितना हिंदू धर्म का।
स्वतंत्रता के पश्चात भारत के पहले शिक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने एक ऐसी शैक्षणिक संरचना की कल्पना की जहाँ गरीबी या लिंग शिक्षा के मार्ग में बाधा न बने; उनके ही कार्यकाल में देश को आईआईटी, यूजीसी और भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) जैसे गौरवशाली संस्थान मिले। उन्होंने 'गुबार-ए-खातिर' और 'इंडिया विन्स फ्रीडम' जैसी कालजयी कृतियों के माध्यम से अपने राजनीतिक व आध्यात्मिक अनुभवों को संजोया, जो आज भी शोधार्थियों के लिए प्रकाश स्तंभ हैं। 22 फरवरी 1958 को उनके देहावसान तक उन्होंने राष्ट्र की एकता और बौद्धिक प्रगति के लिए स्वयं को समर्पित रखा। भारत सरकार ने 1992 में उन्हें मरणोपरांत 'भारत रत्न' से सम्मानित किया और आज उनके जन्मदिन को 'राष्ट्रीय शिक्षा दिवस' के रूप में मनाकर देश इस महामानव के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता है, जिनकी विरासत आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष और शिक्षित भारत के कण-कण में रची-बसी है।

