कौन थे माता अमृतानंदमयी देवी? जानिए 'प्रेम से गले लगाने वाली संत' के जीवन और उनके विश्वव्यापी मिशन की अनकही कहानी
केरल में जन्मीं आध्यात्मिक गुरु 'अम्मा' के जीवन संघर्ष, आध्यात्मिक शिक्षाओं, पुरस्कारों और एम्ब्रेसिंग द वर्ल्ड फाउंडेशन के सामाजिक कार्यों का पूरा विवरण।

भारतीय अध्यात्म और मानवता के इतिहास में कुछ ऐसी विभूतियों का अवतरण हुआ है जिन्होंने बिना किसी भेदभाव के संपूर्ण विश्व को अपने प्रेम के सूत्र में पिरोया है, और इन्हीं अद्वितीय मार्गदर्शकों में केरल की पावन भूमि पर जन्मीं माता अमृतानंदमयी देवी का नाम अग्रगण्य है। जिन्हें दुनिया भर में उनके अनुयायी 'अम्मा', 'अम्माची' या 'मां' के नाम से पूजते हैं, उनका जीवन करुणा और निस्वार्थ सेवा का एक ऐसा जीवंत महाकाव्य है जो आधुनिक युग में सनातन धर्म के 'वसुधैव कुटुंबकम' के सिद्धांत को साक्षात चरितार्थ करता है। केरल के कोलम जिले में स्थित अलप्पढ़ पंचायत के एक छोटे से तटीय गांव पर्यकडवु में 27 सितम्बर 1953 को सुधामणि इदमन्नेल के रूप में जन्मी इस अलौकिक चेतना का प्रारंभिक जीवन अत्यधिक संघर्षों और निर्धनता के बीच बीता। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण मात्र नौ वर्ष की अल्पायु में ही उनका विद्यालय जाना छूट गया और उन पर अपने छोटे भाई-बहनों की देखभाल सहित घरेलू कामकाज की पूरी जिम्मेदारी आ गई। इस दैनिक दिनचर्या के दौरान जब सुधामणि अपने परिवार के मवेशियों के लिए पड़ोसियों से बचा हुआ भोजन एकत्र करने जाती थीं, तब समाज में व्याप्त घोर दरिद्रता और लोगों के दुखों ने उनके संवेदनशील मन को गहरे तक झकझोर दिया। वे अक्सर अपने स्वयं के निर्धन परिवार की इच्छा के विरुद्ध जाकर घर से वस्त्र और भोजन लाकर पीड़ितों में बांट देती थीं, जिसके लिए उन्हें परिजनों की गंभीर डांट और दंड का भी सामना करना पड़ता था। इसी दौर में उनके भीतर की सार्वभौमिक करुणा एक अनोखे रूप में प्रकट हुई, जब उन्होंने दुखी लोगों को ढांढस बंधाने के लिए उन्हें सीधे अपने गले से लगाना शुरू कर दिया। उस रूढ़िवादी दौर में जब एक चौदह वर्ष की किशोरी के लिए किसी को भी और विशेषकर पुरुषों को स्पर्श करने की सामाजिक अनुमति नहीं थी, सुधामणि ने सभी बंधनों से परे जाकर मानवता को प्राथमिकता दी। उनका यह आलिंगन किसी शारीरिक स्पर्श मात्र का प्रतीक नहीं था, बल्कि यह एक ऐसी ईश्वरीय अनुभूति थी जिसने जाति, धर्म, लिंग और राष्ट्र की सीमाओं को पूरी तरह मिटा दिया। माता-पिता द्वारा विवाह के अनेक प्रयासों को दृढ़तापूर्वक अस्वीकार करते हुए उन्होंने अपना संपूर्ण अस्तित्व जगत कल्याण को समर्पित कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 1981 में उनके शिष्यों की बढ़ती संख्या के साथ माता अमृतानंदमयी मठ की विधिवत स्थापना हुई।
समय के साथ सुधामणि का यह व्यक्तिगत सेवा भाव एक विराट वैश्विक आंदोलन में परिवर्तित हो गया, जिसे आज दुनिया 'एम्ब्रेसिंग द वर्ल्ड' के नाम से जानती है। वर्ष 1987 से अपने भक्तों के विशेष आग्रह पर अम्मा ने वैश्विक यात्राओं की शुरुआत की, जिसके तहत उन्होंने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, जर्मनी, जापान, रूस और स्विट्ज़रलैंड सहित दुनिया के दर्जनों देशों में निरंतर आध्यात्मिक कार्यक्रमों का आयोजन कर करोड़ों लोगों को शांति का संदेश दिया। अम्मा के जीवन का केंद्रबिंदु उनका विशिष्ट 'दर्शन' है, जिसमें वे बिना थके लगातार बीस-बीस घंटों तक बैठकर लाखों लोगों को व्यक्तिगत रूप से गले लगाती हैं और उनके आंसू पोंछती हैं। एक अनुमान के अनुसार वे अब तक दुनिया भर के 29 मिलियन से अधिक लोगों को अपने इस प्रेममयी आलिंगन से सांत्वना दे चुकी हैं। अम्मा की आध्यात्मिक शिक्षाएं वेदों और भगवद गीता के शाश्वत ज्ञान पर आधारित हैं, जिसमें वे कर्म, ज्ञान और भक्ति के समन्वय को आत्म-साक्षात्कार के लिए अनिवार्य मानती हैं। वे सभी धर्मों को मन की शुद्धि का विविध मार्ग मानती हैं और इस बात पर बल देती हैं कि वास्तविक मुक्ति या 'जीवनमुक्ति' मृत्यु के बाद की स्थिति नहीं, बल्कि इसी जीवित शरीर में पूर्ण चेतना और समत्व को प्राप्त कर लेना है। उनके इस दर्शन ने केवल उपदेशों तक सीमित न रहकर एक विशाल सामाजिक व धर्मार्थ साम्राज्य का रूप ले लिया है। उनके नेतृत्व में माता अमृतानंदमयी मठ ने बेघरों के लिए एक लाख से अधिक मकानों का निर्माण, चिकित्सा विज्ञान संस्थान (एआईएमएस अस्पताल) के माध्यम से मुफ्त चिकित्सा, अमृता विश्व विद्यापीठम विश्वविद्यालय जैसी शीर्ष शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना, अनाथालयों का संचालन, वृद्धों व विधवाओं के लिए पेंशन और 2004 की विनाशकारी सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं में अभूतपूर्व राहत एवं पुनर्वास कार्य किए हैं। मानवता के प्रति उनके इन अप्रतिम योगदानों के कारण उन्हें जेनेवा में संयुक्त राज्य संघ द्वारा अहिंसा के लिए प्रतिष्ठित 'गांधी-किंग अवार्ड', पार्लियामेंट ऑफ द वर्ल्ड रिलिजन्स द्वारा 'प्रेसिडेंट ऑफ द हिन्दू फेथ' सम्मान, जेम्स पार्क मॉर्टन इंटरफेथ अवार्ड और स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क द्वारा मानद डॉक्टरेट जैसी अनेक वैश्विक उपाधियों से विभूषित किया गया है। यद्यपि उनके बढ़ते प्रभाव और आध्यात्मिक पद्धतियों को लेकर 1985 में 'मठ अमृतानंदमयी: सेक्रेड स्टोरीज एंड रियलिटीज' नामक पुस्तक के माध्यम से वैचारिक आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा, परंतु अम्मा का सेवा मिशन इन सबसे अप्रभावित रहकर निरंतर आगे बढ़ता रहा। उनके द्वारा बीस से अधिक भाषाओं में गाए गए भजनों और दर्जनों आध्यात्मिक साक्षात्कारों ने वैश्विक स्तर पर मानवीय चेतना को परिष्कृत करने का काम किया है।
माता अमृतानंदमयी देवी का संपूर्ण जीवन इस बात का साक्षात प्रमाण है कि निस्वार्थ प्रेम और करुणा ही संसार के सबसे बड़े घावों को भरने की शक्ति रखते हैं। आज वे केवल एक आध्यात्मिक गुरु के रूप में ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर मानवीय एकता, महिला सशक्तिकरण और शांति की एक ऐसी कालजयी प्रतीक बन चुकी हैं जिनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को निरंतर परोपकार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती रहेगी।

