क्या है मराठा साम्राज्य? हिंदवी स्वराज्य की स्थापना से लेकर उपमहाद्वीप में प्रभुत्व की गाथा
छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित मराठा साम्राज्य का भारतीय उपमहाद्वीप में विस्तार, सैन्य नीतियां और ऐतिहासिक महत्व।

सत्रहवीं शताब्दी में भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमी दक्कन पठार से उभरा मराठा साम्राज्य केवल एक राजनीतिक शक्ति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनरुत्थान और अस्मिता का प्रतीक था। वर्तमान महाराष्ट्र की इस पावन भूमि पर छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा बोया गया 'हिंदवी स्वराज्य' का बीज अठारहवीं सदी आते-आते एक विशाल साम्राज्य के रूप में वटवृक्ष बन गया। भारतीय इतिहास में मराठा साम्राज्य का महत्व इस दृष्टि से अतुलनीय है कि इसने न केवल तत्कालीन मुगल सत्ता के एकाधिकार को चुनौती दी, बल्कि विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध एक सुदृढ़ और राष्ट्रव्यापी प्रतिरोध का नेतृत्व भी किया। अपने चरमोत्कर्ष पर यह साम्राज्य उपमहाद्वीप के लगभग एक-तिहाई भू-भाग पर नियंत्रण रखता था। इसकी प्रशासनिक कुशलता, उन्नत सैन्य नीतियां और सांस्कृतिक चेतना ने भारत के आधुनिक इतिहास को एक नई दिशा दी, जिसका स्मरण आज भी देश के गौरवशाली अतीत के रूप में किया जाता है।
इस महान साम्राज्य की आधारशिला भोंसले राजवंश के एक दूरदर्शी रणनीतिकार और वीर योद्धा छत्रपति शिवाजी महाराज (1630–1680) ने रखी थी। सन् 1645 में बीजापुर सल्तनत से तोरणा का किला जीतकर उन्होंने जिस प्रतिरोध की शुरुआत की, वह क्रमिक रूप से किलों की एक अभेद्य श्रृंखला में तब्दील हो गई। सन् 1674 में रायगढ़ को राजधानी बनाकर उनका छत्रपति के रूप में राज्याभिषेक होना भारतीय इतिहास की एक युगांतरकारी घटना थी। शिवाजी महाराज के देहावसान के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र छत्रपति संभाजी महाराज ने इस विरासत को आगे बढ़ाया। उन्होंने मुगल सम्राट औरंगजेब की पांच लाख से अधिक की विशाल सेना और संपूर्ण शाही तंत्र के विरुद्ध लगभग आठ वर्षों तक अत्यंत कठिन और सफल संघर्ष का नेतृत्व किया। सन् 1689 में मुगलों द्वारा उनकी निर्मम हत्या के पश्चात, उनके भाई राजाराम और तदुपरांत राजाराम की विधवा महारानी ताराबाई ने अपने पुत्र शिवाजी द्वितीय के नाम पर इस स्वतंत्रता संग्राम की मशाल को प्रज्वलित रखा और मुगलों को दक्कन की धरती पर परास्त होने के लिए विवश कर दिया।
औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात सन् 1707 में मुगलों की कैद से मुक्त होकर शिवाजी महाराज के पौत्र छत्रपति शाहूजी महाराज ने सातारा में अपनी सत्ता स्थापित की। शाहूजी के कालखंड में मराठा इतिहास में एक नया प्रशासनिक और सैन्य मोड़ आया, जब उन्होंने सन् 1713 में बालाजी विश्वनाथ को अपना 'पेशवा' (प्रधानमंत्री) नियुक्त किया। पेशवा बालाजी विश्वनाथ की कूटनीतिक कुशलता के कारण मुगलों को शाहूजी को वास्तविक छत्रपति स्वीकार करना पड़ा। उनके बाद उनके पराक्रमी पुत्र पेशवा बाजीराव प्रथम (1720–1740) ने मराठा साम्राज्य के भौगोलिक विस्तार को अप्रत्याशित गति दी। बाजीराव प्रथम ने पालखेड़ के युद्ध में हैदराबाद के निजाम को अपनी सैन्य रणनीति से अचंभित करते हुए परास्त किया और दिल्ली के उपनगरों तक एक बिजली कड़कने जैसी तीव्र सैन्य चढ़ाई की। उनके समय में मालवा, बुंदेलखंड और गुजरात तक मराठा पताका लहराने लगी तथा उनके भाई चिमाजी अप्पा ने वसई के युद्ध में पुर्तगालियों को पराजित कर पश्चिमी तट पर अपनी धाक जमाई।
अठारहवीं शताब्दी के मध्य तक पेशवा बालाजी बाजीराव (नानासाहेब) के नेतृत्व में मराठा शक्ति अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच चुकी थी। राघोजी भोंसले ने पूर्व की ओर कदम बढ़ाते हुए ओडिशा को स्थायी रूप से साम्राज्य में शामिल किया और बंगाल तथा बिहार के नवाबों से चौथ वसूल की। उत्तर में रघुनाथ राव के नेतृत्व में मराठों ने सन् 1757-58 में दिल्ली और लाहौर पर नियंत्रण स्थापित करते हुए अटक और पेशावर तक अपनी सीमाएं विस्तृत कर दीं। इस प्रकार पुणे के पेशवा केnominal नेतृत्व में एक शक्तिशाली मराठा परिसंघ (कॉन्फेडरेसी) का उदय हुआ, जिसमें ग्वालियर के सिंधिया (शिंदे), इंदौर के होल्कर, बड़ौदा के गायकवाड़ और नागपुर के भोंसले जैसे चार प्रमुख स्वायत्त शासक शामिल थे। हालांकि, इस तीव्र विस्तार के दौरान अन्य क्षेत्रीय शक्तियों जैसे जाटों और राजपूतों पर अत्यधिक कर लगाने और उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के कारण मराठों ने उनके साथ संबंध बिगाड़ लिए। इसका परिणाम सन् 1761 के पानीपत के तीसरे युद्ध में देखने को मिला, जहां अहमद शाह अब्दाली की दुर्रानी सेना के खिलाफ मराठा सेनापति सदाशिवराव भाऊ और विश्वासराव की वीरता के बावजूद, स्थानीय सहयोग के अभाव में मराठों को एक भारी पराजय का सामना करना पड़ा।
पानीपत के इस भीषण आघात के मात्र दस वर्ष के भीतर ही चौथे पेशवा माधवराव प्रथम के कुशल नेतृत्व में मराठों ने अभूतपूर्व पुनरुत्थान किया। माधवराव ने दक्षिण में मैसूर के हैदर अली और हैदराबाद के निजाम को घुटने टेकने पर विवश किया, तो वहीं उत्तर में महादजी शिंदे (सिंधिया) और तुकोजीराव होल्कर जैसे महान सेनानायकों ने पुनः मराठा वर्चस्व स्थापित कर दिया। सन् 1771 में महादजी शिंदे ने दिल्ली पर पुनः अधिकार कर मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय को अपने संरक्षण में लेकर एक कठपुतली शासक के रूप में सिंहासन पर बैठाया। महादजी ने जाटों, राजपूतों और रोहिल्ला अफगानों को निर्णायक रूप से पराजित किया तथा सिखों के साथ संधि कर यमुना और सतलज क्षेत्र तक अपना प्रभाव बढ़ाया। हालांकि, सन् 1772 में मात्र 27 वर्ष की आयु में पेशवा माधवराव की असामयिक मृत्यु ने साम्राज्य की केंद्रीय सत्ता को कमजोर कर दिया, जिसके बाद पूना के दरबार में उत्तराधिकार का गृहयुद्ध छिड़ गया।
साम्राज्य के अंतिम दौर में आंतरिक कलह और सरदारों की बढ़ती स्वायत्तता ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को हस्तक्षेप करने का स्वर्णिम अवसर दे दिया। रघुनाथराव की सत्ता-लोलुपता के कारण सन् 1775 से 1782 तक प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध हुआ, जिसमें मराठों ने बड़गाँव के युद्ध में अंग्रेजों को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर किया। बाद के वर्षों में यशवंतराव होल्कर, दौलतराव सिंधिया और पेशवा बाजीराव द्वितीय के आपसी मतभेदों ने परिसंघ की एकता को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया। सन् 1802 में होल्कर से पराजित होकर पेशवा बाजीराव द्वितीय ने अंग्रेजों की शरण ली और बेसिन की संधि पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके परिणामस्वरूप हुए द्वितीय और तृतीय आंग्ल-मराठा युद्धों (1803–1818) में बिखर चुके मराठा सरदारों की व्यक्तिगत वीरता भी अंग्रेजों की आधुनिक सैन्य शक्ति और कूटनीति के सामने टिक नहीं सकी। सन् 1818 तक ब्रिटिश सेना ने मराठा परिसंघ को पूरी तरह समाप्त कर भारत में अपनी संप्रभुता स्थापित कर ली। इस पतन के बावजूद, मराठा साम्राज्य का इतिहास स्वदेशी शासन की अदम्य इच्छाशक्ति, सैन्य नवाचारों और भारतीय राष्ट्रवाद की शुरुआती चेतना के रूप में सदैव अमर रहेगा।

