उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में एक ब्राह्मण परिवार में दिवाकर पांडेय के घर जन्मे मंगल पांडेय का व्यक्तित्व साहस और स्वाभिमान का अनूठा मिश्रण था। सन् 1849 में मात्र 22 वर्ष की आयु में वे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में शामिल हुए और अपनी निष्ठा व अनुशासन के बल पर 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री में एक सैनिक के रूप में अपनी जगह बनाई। लेकिन नियति ने उनके लिए एक साधारण सैनिक के बजाय एक महान क्रांतिकारी का मार्ग चुना था, जिसकी शुरुआत तब हुई जब सेना में नई 'पैटर्न 1853 एनफील्ड' राइफलें शामिल की गईं। इन राइफलों के कारतूसों पर लगी ग्रीस के बारे में यह खबर फैल गई कि इसे बनाने में गाय और सुअर की चर्बी का उपयोग किया गया है, जिसे उपयोग करने के लिए दांतों से काटना पड़ता था। धार्मिक मान्यताओं और व्यक्तिगत स्वाभिमान पर आए इस संकट ने मंगल पांडेय के भीतर विद्रोह की ज्वाला भड़का दी। 29 मार्च 1857 को बैरकपुर परेड ग्राउंड पर वह ऐतिहासिक क्षण आया जब उन्होंने खुलेआम विद्रोह का बिगुल फूंक दिया और रेजिमेंट के अधिकारी लेफ्टिनेंट बाग पर हमला कर उन्हें घायल कर दिया। हालांकि जनरल जॉन हियरसी ने उन्हें गिरफ्तार करने का आदेश दिया, लेकिन शेख पलटू को छोड़कर पूरी रेजिमेंट ने अपने ही साथी के खिलाफ जाने से इनकार कर दिया। जब मंगल पांडेय ने देखा कि वे चारों ओर से घिर चुके हैं, तो उन्होंने आत्मसमर्पण के बजाय स्वयं को गोली मारकर बलिदान देना बेहतर समझा, हालांकि वे उस प्रयास में केवल घायल हुए। इस घटना के बाद उन पर कोर्ट-मार्शल चलाया गया और निर्धारित तिथि से दस दिन पूर्व ही 8 अप्रैल 1857 को उन्हें फांसी दे दी गई। उनके इस बलिदान ने मेरठ से लेकर पूरे उत्तर भारत में वह मशाल रोशन की, जिसने 1857 के गदर का रूप लिया और अंग्रेजों को यह अहसास करा दिया कि अब भारत पर उनकी हुकूमत के दिन गिनती के रह गए हैं। मंगल पांडेय का अदम्य साहस आज भी भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है, जिनकी स्मृति में भारत सरकार ने 1984 में एक डाक टिकट भी जारी किया।

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