महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थित वाई तहसील के मांडहरदेव की पहाड़ियों पर विराजमान श्री कालेश्वरी, जिन्हें भक्त प्यार और श्रद्धा से 'कालुबाई' पुकारते हैं, आदिशक्ति आदिमाया पार्वती का साक्षात् अवतार मानी जाती हैं। समुद्र तल से लगभग 5000 फीट की ऊंचाई पर स्थित शंभू-महादेव पर्वत श्रृंखला के घने करवंडी वनों के बीच बसा यह पावन धाम न केवल प्राकृतिक सुंदरता से ओतप्रोत है, बल्कि इसका इतिहास द्वापर युग के अंत और ऋषि-मुनियों की कठोर तपस्या से जुड़ा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस क्षेत्र में मांडव्य ऋषि अपने आश्रम में भगवान शिव की आराधना किया करते थे, जिनके नाम पर ही इस पर्वत का नाम मांडहरगढ़ पड़ा। उस समय असुरराज रत्नासूर का सेनापति लख्यासुर अपनी क्रूरता से ऋषियों के यज्ञ और शांति में निरंतर विघ्न डाल रहा था। जब संकट गहरा गया, तब मांडव्य ऋषि की पत्नी मंदाबाई ने अपनी पुकार से आदिमाया पार्वती को जागृत किया। देवी अपने भक्तों की रक्षा के लिए कैलाश से पृथ्वी पर अवतरित हुईं और उनके इस धर्मयुद्ध में कालभैरवनाथ ने उनकी सहायता की। चूंकि लख्यासुर को दिन के समय अजेय रहने का वरदान प्राप्त था, इसलिए देवी ने पौष पूर्णिमा की मध्यरात्रि को अत्यंत भीषण युद्ध के उपरांत उसका वध कर दिया और उसके रक्त की एक-एक बूंद पी ली ताकि वह पुन: जन्म न ले सके। इसी विजय के उपरांत देवी भक्तों के कल्याण हेतु इसी पर्वत शिखर पर स्थापित हो गईं।

मंदिर का वास्तु शिल्प अत्यंत प्राचीन है और इसकी बनावट प्रसिद्ध हेमाड़पंथी शैली की याद दिलाती है, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को और भी सुदृढ़ करती है। मंदिर के गर्भगृह में कालुबाई की दो फीट ऊंची, सिंदूरी रंग की चतुर्भुज प्रतिमा विराजमान है, जो साक्षात् महिषासुर मर्दिनी का रूप है। उनके हाथों में त्रिशूल, ढाल, तलवार और असुर का शीश सुशोभित है, जबकि उनके चरणों के नीचे महादेव की पिंड स्थित है। भक्त अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर माता को हरी साड़ी और खण-नारियल अर्पित करते हैं। मंदिर परिसर में देवी के अंगरक्षक के रूप में गोंजी बाबा और मांगिर बाबा के मंदिर भी स्थित हैं, जो इस दुर्ग की रक्षा के प्रतीक माने जाते हैं। स्थानीय मान्यता है कि पांडवों ने भी अपने अज्ञातवास के दौरान इस पर्वत पर रहकर माता कालुबाई की पूजा-अर्चना की थी। आज भी पौष पूर्णिमा के अवसर पर यहां एक विशाल वार्षिक मेले का आयोजन होता है, जिसमें महाराष्ट्र और देशभर से लाखों श्रद्धालु 'बोल मांडहरच्या कालीचा चांगभलं' के जयघोष के साथ शामिल होते हैं। यह पावन स्थल केवल एक धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि अधर्म पर धर्म की विजय और स्त्री शक्ति के उस शौर्य का प्रतीक है जो युगों-युगों से जनमानस को प्रेरित कर रहा है।

Pratahkal HQ

Pratahkal HQ

Next Story