कौन थे विश्वामित्र? एक प्रतापी सम्राट के 'ब्रह्मर्षि' बनने और गायत्री मंत्र के दृष्टा बनने की अद्भुत गाथा।
क्षत्रिय राजा कौशिक के कठिन तप से ब्रह्मर्षि बनने, वशिष्ठ से संघर्ष और ऋग्वेद के गायत्री मंत्र की रचना की संपूर्ण ऐतिहासिक यात्रा।

वैदिक काल के इतिहास में महर्षि विश्वामित्र का व्यक्तित्व एक ऐसे प्रखर तेज के समान है, जिसने अपनी संकल्प शक्ति से नियति की रेखाओं को बदल दिया। ऋषि बनने से पूर्व वे एक पराक्रमी और प्रजावत्सल क्षत्रिय राजा थे, जिन्हें राजा कौशिक के नाम से जाना जाता था। उनके पूर्वज कुश और पिता राजा गाधि के गौरवशाली वंश ने उन्हें शौर्य विरासत में दिया था। जब राजा गाधि ने वानप्रस्थ आश्रम स्वीकार किया, तब विश्वामित्र ने राजसिंहासन संभाला और अपनी कुशलता से प्रजा को असीम सुख प्रदान किया। उनके जीवन में एक बड़ा मोड़ तब आया जब उन्होंने दिग्विजय का संकल्प लिया और बारह वर्षों तक निरंतर युद्ध कर अपने साम्राज्य का विस्तार किया। इसी सैन्य अभियान के दौरान उनका सामना महर्षि वशिष्ठ से हुआ, जहाँ से उनके जीवन की दिशा सदैव के लिए बदल गई।
वशिष्ठ के आश्रम में दिव्य कामधेनु गाय 'नंदिनी' के चमत्कार को देख राजा विश्वामित्र के भीतर उसे पाने का मोह जाग उठा। जब वशिष्ठ ने अपनी प्राणप्रिय नंदिनी को देने से मना कर दिया, तो अहंकारवश विश्वामित्र ने बल प्रयोग किया। परिणाम स्वरूप, नंदिनी की योग शक्ति से उत्पन्न सेना ने विश्वामित्र की विशाल वाहिनी को परास्त कर दिया और वशिष्ठ के तेज ने उनके सौ पुत्रों को भस्म कर दिया। इस पराजय ने विश्वामित्र को यह बोध कराया कि शस्त्र बल, ब्रह्म बल के सामने तुच्छ है। प्रतिशोध और आत्म-ज्ञान की इसी ज्वाला ने उन्हें राजपाट त्यागकर हिमालय की कंदराओं में घोर तपस्या करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न कर दिव्य अस्त्र प्राप्त किए, किंतु वशिष्ठ के ब्रह्मतेज के सामने उनके सभी दैवीय अस्त्र निष्फल हो गए।
अपनी तपस्या के क्रम में विश्वामित्र ने अनेक कठिन परीक्षाओं का सामना किया। उन्होंने राजा त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेजने का हठ किया और जब देवताओं ने उन्हें रोका, तो अपनी तपोबल से एक नई सृष्टि और नक्षत्र मंडल की रचना तक कर डाली। उनकी तपस्या की तीव्रता से भयभीत होकर इंद्र ने कई बाधाएं डालीं, यहाँ तक कि स्वयं भिक्षुक बनकर उनका भोजन भी मांगा, जिसे विश्वामित्र ने बिना क्रोध किए सहर्ष दान कर दिया। अंततः, उनकी निष्काम तपस्या और इंद्रिय विजय से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें 'ब्राह्मणत्व' प्रदान किया। किंतु विश्वामित्र की पूर्णता तब हुई जब उनके भीतर का अहंकार पूर्णतः नष्ट हो गया और स्वयं महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें गले लगाकर 'ब्रह्मर्षि' के रूप में स्वीकार किया।
विश्वामित्र का योगदान केवल व्यक्तिगत तप तक सीमित नहीं रहा; वे ऋग्वेद के तीसरे मंडल के रचयिता हैं और संपूर्ण मानवता को कल्याणकारी 'गायत्री मंत्र' उन्हीं के माध्यम से प्राप्त हुआ। रामायण काल में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही, जहाँ उन्होंने किशोर राम और लक्ष्मण को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी और ताड़का व सुबाहु जैसे राक्षसों का अंत कराकर धर्म की स्थापना की। एक क्षत्रिय राजा से सप्तऋषियों में स्थान पाने तक का उनका सफर यह सिद्ध करता है कि मनुष्य अपने कुल से नहीं, बल्कि अपने कर्म, दृढ़ संकल्प और तपस्या से महान बनता है। आज भी विश्वामित्र का नाम पुरुषार्थ और ज्ञान के समन्वय के रूप में अमर है।

