कौन थे महर्षि वसिष्ठ? जानिए वैदिक काल के उस महान सप्तऋषि की गौरवशाली गाथा जिन्होंने श्रीराम को दिया था योग ज्ञान।
ब्रह्मा के मानस पुत्र और राजा दशरथ के राजगुरु महर्षि वसिष्ठ ने योग वसिष्ठ के माध्यम से भगवान श्रीराम को वैराग्य, ज्ञान और अध्यात्म की गहन शिक्षा दी थी।

वैदिक काल के महानतम संतों और आध्यात्मिक गुरुओं में महर्षि वसिष्ठ का स्थान अद्वितीय है। वे उन सात परम पूजनीय ऋषियों यानी सप्तऋषियों में से एक हैं, जिन्होंने साक्षात ईश्वर से परम सत्य का ज्ञान प्राप्त किया था। सनातन परंपरा में वेदों को नित्य और शाश्वत माना गया है, इसलिए यह कहना सर्वथा अनुचित होगा कि वेदों की रचना की गई, बल्कि महर्षि वसिष्ठ उन दिव्य दृष्टाओं में से एक थे जिन्होंने ईश्वर से प्राप्त उस अनादि ज्ञान को आत्मसात किया और मानवता के कल्याण के लिए उसे वेदों के माध्यम से प्रकट किया। ब्रह्मा के मानस पुत्र के रूप में अवतरित हुए महर्षि वसिष्ठ त्रिकालदर्शी थे, जिनके पास भूत, भविष्य और वर्तमान को स्पष्ट रूप से देखने की अलौकिक क्षमता थी। उनका विवाह प्रजापति दक्ष और प्रसूति की पुत्री देवी अरुंधति से हुआ था, और यह पावन दंपती आज भी आकाश मंडल में सप्तऋषि तारा समूह के रूप में चमकते हुए सात देदीप्यमान सितारों की कतार में एक साथ दिखाई देता है।
महर्षि वसिष्ठ का जीवन केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं था, बल्कि वे इक्ष्वाकु वंश यानी सूर्यवंशी राजाओं के कुलगुरु और मार्गदर्शक भी थे। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के पिता राजा दशरथ के वे राजगुरु थे, और उनके परामर्श तथा अनुमति के बिना सूर्यवंश का कोई भी राजा किसी भी धार्मिक या मांगलिक कार्य का आरंभ नहीं करता था। उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और दिव्य अध्याय तब सामने आता है जब उन्होंने 'योग वसिष्ठ' के माध्यम से स्वयं भगवान श्रीराम को वैराग्य, ज्ञान और अध्यात्म की गहन शिक्षा दी और उनके गुरु के रूप में प्रतिष्ठित हुए। महर्षि वसिष्ठ का चरित्र करुणा, क्षमा और असीम धैर्य की पराकाष्ठा था, जिसका सबसे बड़ा प्रमाण तब मिलता है जब राजा विश्वामित्र ने ईर्ष्यावश उनके सौ पुत्रों का वध कर दिया था, लेकिन महर्षि ने अपनी परम आत्मिक शांति और क्षमाशीलता का परिचय देते हुए विश्वामित्र को सहर्ष माफ कर दिया। त्रेतायुग के अंत में अपनी सांसारिक लीला और कर्तव्यों को पूर्ण कर वे ब्रह्मलोक को प्रस्थान कर गए। महर्षि वसिष्ठ का जीवन और उनकी शिक्षाएं आज भी मानवीय चेतना के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ के रूप में स्थापित हैं, जो क्षमा और ज्ञान की अमर विरासत को जीवंत रखती हैं।

