कौन थे महर्षि दुर्वासा? जानिए उनके क्रोध, अमरीश के साथ विवाद और सुदर्शन चक्र से जुड़ी ऐतिहासिक कथा।
श्रीमद्भागवत और शिव पुराण के अनुसार ऋषि दुर्वासा के क्रोध, एकादशी व्रत पारण संकट और सुदर्शन चक्र से जुड़ी ऐतिहासिक घटनाओं का विस्तृत विवरण।

सनातन धर्म के इतिहास में अपने तीव्र क्रोध और अद्वितीय तपस्या के लिए विख्यात एक ऐसे ऋषि हुए, जिनकी शक्ति के आगे देवता भी नतमस्तक रहते थे।
सनातन धर्म में महर्षि अत्रि और माता अनुसूया के पुत्र तथा महर्षि दत्तात्रेय एवं चंद्रदेव के भाई महर्षि दुर्वासा एक अत्यंत सम्मानित और प्रतापी ऋषि के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जिन्हें अपनी दिव्य शक्तियों के कारण सर्वत्र पूजनीय माना गया है। महाकवि कालिदास की कालजयी रचना 'अभिज्ञान शाकुंतलम' में भी उनके इसी प्रचंड तेज का वर्णन मिलता है, जहां उनके द्वारा दिए गए शाप के कारण दुष्यंत अपनी प्रियतमा शकुंतला को भूल गए थे और यह घटना अंततः सत्य सिद्ध हुई। महर्षि दुर्वासा के जीवन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध घटना महाराज अंबरीश के साथ उनके विवाद की है, जिसका विस्तृत वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण में विस्तार से मिलता है। महाराज अंबरीश भगवान विष्णु के अनन्य और परम भक्त थे, जो सदैव सत्य के मार्ग पर चलते थे और उन्होंने अपने राज्य की सुख, शांति और समृद्धि के लिए पूर्ण भक्तिभाव से एक महान यज्ञ का अनुष्ठान किया था। इसी दौरान राजा अंबरीश ने एकादशी का कठिन व्रत रखा, जिसका नियम एकादशी से प्रारंभ होकर द्वादशी को पारण के साथ पूर्ण होना था, और नियमानुसार व्रत खोलने के पश्चात ऋषियों को भोजन कराना अनिवार्य था। जब द्वादशी के दिन व्रत के पारण का समय अत्यंत निकट आ गया, ठीक उसी समय महर्षि दुर्वासा महाराज अंबरीश के राजमहल पधारे, जहां राजा ने अत्यंत आदर-सत्कार के साथ उनका स्वागत किया और उन्हें भोजन के लिए सादर आमंत्रित किया। महर्षि दुर्वासा ने राजा के इस निवेदन को सहर्ष स्वीकार तो कर लिया, परंतु उन्होंने शर्त रखी कि राजा तब तक अपना व्रत न खोलें जब तक कि वे नदी में स्नान करके वापस न लौट आएं। इसके बाद काफी समय बीत जाने पर भी जब महर्षि दुर्वासा वापस नहीं लौटे और द्वादशी तिथि समाप्त होने का समय आ गया, तो राजा अंबरीश के समक्ष धर्मसंकट खड़ा हो गया, जिसके समाधान के लिए उन्होंने अपने गुरु वशिष्ठ की आज्ञा और परामर्श से केवल एक तुलसी दल (तुलसी का पत्ता) ग्रहण करके अपना व्रत खोला और ऋषि की प्रतीक्षा करने लगे। नदी से लौटने पर जब महर्षि दुर्वासा को इस बात का भान हुआ, तो उन्होंने इसे अपना घोर अपमान समझा और अत्यंत क्रोधित होकर अपनी जटा से एक भयानक राक्षस उत्पन्न कर उसे अंबरीश का वध करने का आदेश दे दिया। भक्त की रक्षा के लिए उसी क्षण भगवान नारायण का सुदर्शन चक्र वहां प्रकट हुआ, जिसने न केवल उस राक्षस का संहार किया बल्कि महाराज अंबरीश की रक्षा करते हुए दुर्वासा ऋषि का पीछा करना भी प्रारंभ कर दिया। सुदर्शन चक्र के भयंकर भय से व्याकुल होकर महर्षि दुर्वासा शरण की याचना के लिए पहले सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी और फिर देवों के देव महादेव शिव जी के पास पहुंचे, परंतु दोनों ने ही सुदर्शन चक्र के सामने अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए उन्हें राजा अंबरीश से ही क्षमा मांगने का परामर्श दिया, जिसके बाद महर्षि दुर्वासा ने महाराज से क्षमा याचना की और अंबरीश ने भगवान विष्णु की स्तुति कर सुदर्शन चक्र को शांत करते हुए ऋषि के प्राणों की रक्षा की। इस पौराणिक प्रसंग का एक अन्य दृष्टिकोण शिव पुराण में भी प्राप्त होता है, जिसके अनुसार राजा अंबरीश द्वारा भोजन अर्पित करने से पूर्व व्रत तोड़ने को महर्षि दुर्वासा ने अपना अपमान माना और क्रोधवश राजा के वध का निर्णय लिया, जिससे अंबरीश की रक्षा हेतु सुदर्शन चक्र प्रकट अवश्य हुआ, परंतु महर्षि दुर्वासा के साक्षात शिव स्वरूप को देखकर वह वहीं रुक गया, और उसी समय नंदी की आकाशवाणी द्वारा यह प्रकट हुआ कि स्वयं महादेव अंबरीश की भक्ति की परीक्षा लेने आए थे, जिसके बाद अंबरीश ने ऋषि से क्षमा मांगी और महर्षि दुर्वासा ने प्रसन्न होकर उन्हें अपना दिव्य आशीर्वाद प्रदान किया। महर्षि दुर्वासा का यह संपूर्ण जीवन वृत्तांत सनातन इतिहास में इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सच्ची भक्ति और न्याय के सम्मुख बड़े से बड़ा क्रोध और अहंकार भी सदैव शांत हो जाता है, और उनकी यह गाथा युगों-युगों तक भक्तों की रक्षा और तपस्या के महत्व को रेखांकित करती रहेगी।

