कौन थे महर्षि भरद्वाज? जानिए उस महान वैदिक ऋषि का इतिहास जिसने गढ़ी इस उपमहाद्वीप की कई गौरवशाली गाथाएं
ऋग्वेद के छठे मंडल के दृष्टा, आयुर्वेद और विमान शास्त्र के प्रणेता तथा प्रयाग के संस्थापक महर्षि भरद्वाज के जीवन, अवदान और वंश परंपरा का विस्तृत ऐतिहासिक विवरण।

सनातन धर्म और प्राचीन भारतीय इतिहास में सप्तर्षियों में उच्च स्थान रखने वाले महर्षि भरद्वाज एक ऐसी विलक्षण विभूति रहे हैं, जिनका ज्ञान, साधना और अवदान किसी एक क्षेत्र तक सीमित न रहकर संपूर्ण मानव सभ्यता को आलोकित करता है। वृहस्पति और माता ममता के पुत्र के रूप में अवतरित हुए महर्षि भरद्वाज को ऋग्वेद के छठे मंडल का दृष्टा माना जाता है, जिसमें उनके ७६५ मंत्र संकलित हैं और इसके अतिरिक्त अथर्ववेद में भी उनके २३ मंत्र समाहित हैं। वे केवल एक मंत्रदृष्टा ऋषि ही नहीं थे, बल्कि उन्हें प्रयाग का प्रथम निवासी और संस्थापक भी माना जाता है, जहां उन्होंने विश्व के सबसे बड़े गुरुकुल की स्थापना कर हजारों वर्षों तक ज्ञान की अविरल धारा प्रवाहित की थी। शिक्षाशास्त्री, राजतंत्र के मर्मज्ञ, अर्थशास्त्री, शस्त्रविद्या के महान आचार्य, आयुर्वेद के प्रकांड पंडित, न्यायविद, अभियांत्रिकी विशेषज्ञ और वैज्ञानिक जैसी बहुआयामी छवियों को स्वयं में समेटे महर्षि भरद्वाज के जीवन की यात्रा ज्ञान की उस अनवरत खोज की गाथा है जो देवराज इंद्र से लेकर भगवान ब्रह्मा तक विस्तृत रही।
उनका जीवन संघर्ष और ज्ञानार्जन के अनूठे मोड़ों से भरा रहा, जहां उन्होंने ऋक्तंत्र के अनुसार ब्रह्मा, बृहस्पति और इंद्र के बाद चौथे व्याकरणकर्ता के रूप में अपनी पहचान बनाई और स्वयं इंद्र से व्याकरण का गूढ़ ज्ञान प्राप्त किया, तो वहीं ऋषि भृगु ने उन्हें धर्मशास्त्र की दीक्षा दी। उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रसंग आदि कवि महर्षि वाल्मीकि से भी जुड़ता है, जब तमसा नदी के तट पर क्रौंच वध के समय वे वाल्मीकि जी के साथ थे और वाल्मीकि रामायण के अनुसार वे उनके परम शिष्य भी रहे। आयुर्वेद के क्षेत्र में महर्षि भरद्वाज का अवदान अप्रतिम माना जाता है, जिन्होंने इंद्र से आयुर्वेद का अमर ज्ञान प्राप्त कर उसे संहिता बद्ध किया और वायु पुराण के अनुसार 'आयुर्वेद संहिता' नामक ग्रंथ की रचना कर उसे आठ भागों में विभाजित कर अपने शिष्यों को सिखाया, साथ ही चरक संहिता के अनुसार उन्होंने आत्रेय पुनर्वसु को कायचिकित्सा का अमूल्य ज्ञान प्रदान किया। इंद्र से सवित्र्य अग्नि विद्या सीखकर और अग्नि की शक्ति को आत्मसात कर उन्होंने अमरत्व को प्राप्त किया, यही कारण है कि महर्षि चरक ने उन्हें अनंत जीवन काल वाला कहा है।
महर्षि भरद्वाज ने सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए प्रयाग के अधिष्ठाता देव भगवान श्री माधव (भगवान हरि के अवतार) की पवित्र परिक्रमा की व्यवस्था भगवान शिव के आशीर्वाद से स्थापित की, जिसे संसार की पहली परिक्रमा माना जाता है। उन्होंने इस द्वादश माधव परिक्रमा के महत्व को प्रतिपादित करते हुए बताया कि इससे जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश होता है, पुण्यों का उदय होता है, सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और प्रयाग में किए जाने वाले अस्थि विसर्जन, तर्पण, पिंडदान, मुंडन, यज्ञोपवीत, पूजा या कल्पवास जैसे समस्त अनुष्ठान इस परिक्रमा के बिना अपूर्ण और निष्फल रहते हैं। ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में उन्होंने आयुर्वेद संहिता, भरद्वाज स्मृति, भरद्वाज संहिता, राजशास्त्र और 'यंत्र-सर्वस्व' (जिसमें विमान शास्त्र का विस्तृत वर्णन है) जैसे कालजयी ग्रंथों का प्रणयन किया, जिनमें से वर्तमान में केवल यंत्र-सर्वस्व और शिक्षा ही उपलब्ध हैं।
वे केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं रहे बल्कि उनकी वंश परंपरा और गद्दी आज भी भारत के सामाजिक ताने-बाने को समृद्ध कर रही है। महर्षि भरद्वाज खांडल ब्राह्मण समाज के आदि पुरुष और पूर्वज हैं, जिन्होंने समाज को जागृत करते हुए कहा था कि मनुष्य के भीतर की अग्नि ही अमर प्रकाश है और वही सभी कार्यों में सबसे कुशल ऋषि है जो हमें ऊपर उठने की प्रेरणा देती है। उत्तराखंड के उप्रेती और पंचपुरी ब्राह्मण, बरनवाल, और डंगवाल रावत क्षत्रिय इसी भरद्वाज गोत्र से संबंध रखते हैं, जबकि "पाठक" उपनाम वाले ब्राह्मण उनके द्वारा स्थापित गुरुकुल की अध्ययन-अध्यापन की महान परंपरा को आगे बढ़ाने वाले उनके प्रत्यक्ष वंशज माने जाते हैं। इस प्रकार महर्षि भरद्वाज का जीवन, उनके अकादमिक प्रतिमान और आध्यात्मिक चेतना आज भी भारतीय मनीषा के लिए एक शाश्वत प्रकाश स्तंभ की तरह मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं।

