सन 1681 में जन्मे महाराव शार्दुल सिंह शेखावत झुंझुनू के एक ऐसे प्रतापी शासक थे, जिनके शासनकाल को शेखावाटी क्षेत्र में शेखावत शक्ति के चमोत्कर्ष का युग माना जाता है। उनका संपूर्ण जीवन न केवल युद्ध कौशल बल्कि समाज निर्माण और स्थापत्य कला के संरक्षण के प्रति समर्पित रहा। शार्दुल सिंह के निजी जीवन की बात करें तो उन्होंने तीन विवाह किए, जिनमें उनकी पत्नियाँ बीकानेर के नथासर के ठाकुरों और मारवाड़ के मेड़तिया राजवंश से संबंधित थीं। उनके छह पुत्र हुए— ठाकुर जोरावर सिंह, किशन सिंह, बहादुर सिंह, अक्षय सिंह, नवल सिंह और केसरी सिंह। शार्दुल सिंह के नेतृत्व में झुंझुनू न केवल सामरिक दृष्टि से सुदृढ़ हुआ, बल्कि आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से भी समृद्ध हुआ। उन्होंने व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देने के लिए सेठों और व्यापारियों को प्रोत्साहित किया, जिसके परिणामस्वरूप इस क्षेत्र में भव्य हवेलियों का निर्माण हुआ। इन हवेलियों में प्रचलित भित्ति चित्रकला (फ्रेस्को पेंटिंग) का विकास शार्दुल सिंह के काल में ही सर्वाधिक हुआ, जो आज भी औद्योगिक वास्तुकला और कलात्मक उत्कृष्टता के बेजोड़ उदाहरण माने जाते हैं।

महाराव शार्दुल सिंह का सबसे क्रांतिकारी और ऐतिहासिक निर्णय उनके जीवन के अंतिम समय में सामने आया, जिसने राजपूतकालीन उत्तराधिकार की पारंपरिक 'ज्येष्ठाधिकार' (बड़े पुत्र को राज्य मिलना) प्रथा को चुनौती दी। उन्होंने घोषणा की कि उनके स्वर्गवास के बाद झुंझुनू की रियासत उनके सभी जीवित पुत्रों में समान रूप से विभाजित की जाएगी। चूँकि उनके एक पुत्र बहादुर सिंह का निधन उनके जीवनकाल में ही हो गया था, अतः उनकी मृत्यु के पश्चात 1742 में रियासत को पांच समान हिस्सों में बांटा गया, जिसे इतिहास में 'पंचपाना' के नाम से जाना जाता है। उनके पाँचों पुत्रों— जोरावर सिंह, किशन सिंह, अक्षय सिंह, नवल सिंह और केसरी सिंह ने अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए अनेक किलों, महलों और नगरों जैसे नवलगढ़, मुकुंदगढ़, खेतड़ी और मंडावा की स्थापना की। 25 अप्रैल 1742 को उनके निधन के बाद उनकी स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए उनके पुत्रों ने तत्कालीन राजधानी परसरामपुरा में एक भव्य गुंबद (छतरी) का निर्माण करवाया, जो अपनी उत्कृष्ट भित्ति चित्रकला के लिए आज भी विख्यात है। महाराव शार्दुल सिंह का नाम इतिहास में एक ऐसे शासक के रूप में दर्ज है जिन्होंने न केवल साम्राज्य विस्तार किया, बल्कि अपनी दूरदर्शिता से शेखावाटी की भावी समृद्धि और सांस्कृतिक पहचान की नींव रखी।

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