कौन थे महाराणा सांगा? मेवाड़ के वो प्रतापी 'हिंदुपत' शासक जिनके शरीर पर लगे 80 घाव भी उनकी वीरता को कम न कर सके
मेवाड़ के शासक राणा सांगा का जीवन परिचय, बाबर और इब्राहिम लोदी के खिलाफ उनके प्रमुख युद्ध और राजपूताना को एकजुट करने में उनके ऐतिहासिक योगदान का विवरण।

मेवाड़ की पावन धरा पर 12 अप्रैल 1482 को जन्मे महाराणा संग्राम सिंह, जिन्हें इतिहास महाराणा सांगा के नाम से पूजता है, केवल एक राजा नहीं बल्कि अदम्य साहस और राजपूती आन-बान-शान के जीवंत प्रतीक थे। राणा रायमल के सबसे छोटे पुत्र होने के बावजूद, नियति ने उनके मस्तक पर मेवाड़ का तिलक लिखा था। उनके शुरुआती जीवन में राजसिंहासन को लेकर संघर्ष की ऐसी स्थिति बनी कि एक भविष्यवक्ता द्वारा उनके राजा बनने की भविष्यवाणी के बाद उनके ही भाइयों, पृथ्वीराज और जयमल, ने उनके प्राण लेने का प्रयास किया। अपनी रक्षा के लिए उन्हें लंबे समय तक अज्ञातवास में रहना पड़ा, जहाँ उन्होंने अजमेर के कर्मचंद सिंह पंवार की शरण ली। अंततः, संघर्षों की अग्नि में तपकर 1509 में उनका राज्याभिषेक हुआ और यहीं से भारतीय इतिहास के एक ऐसे 'स्वर्ण युग' का सूत्रपात हुआ, जिसने सदियों से चले आ रहे विदेशी आक्रमणकारियों के प्रभाव को चुनौती दी।
महाराणा सांगा एक कुशल रणनीतिकार और दूरदर्शी शासक थे, जिन्होंने खंडित पड़े राजपूताना को 'पाती पेरवन' की प्राचीन परंपरा के तहत एक ध्वज के नीचे संगठित किया। उनके शौर्य का लोहा न केवल दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी ने माना, बल्कि गुजरात और मालवा के सुल्तानों के संयुक्त सैन्य बल भी उनके सामने धराशायी हो गए। सांगा ने खातोली और बाड़ी के युद्धों में इब्राहिम लोदी की सेना को करारी शिकस्त दी, वहीं गागरोन के युद्ध में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी को पराजित कर बंदी बना लिया। उनकी उदारता ऐसी थी कि उन्होंने अपने शत्रु को बंदी बनाने के बाद उसका राज्य उसे वापस लौटा दिया, जिसने उनकी वीरता में मानवता के नए आयाम जोड़े। उन्होंने अपने साम्राज्य का विस्तार उत्तर में सतलुज नदी से लेकर दक्षिण में नर्मदा तक और पश्चिम में सिंधु नदी से पूर्व में ग्वालियर तक कर दिया था, जिससे वह उस समय के उत्तर भारत के सबसे शक्तिशाली हिंदू सम्राट बनकर उभरे।
महाराणा सांगा के जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ मुगल आक्रांता बाबर के साथ उनका संघर्ष था। बाबर ने स्वयं अपनी आत्मकथा 'तुजुक-ए-बाबरी' में स्वीकार किया है कि सांगा उस समय भारत के सबसे प्रतापी और शक्तिशाली राजा थे। फरवरी 1527 में बयाना के युद्ध में सांगा ने बाबर की सेना को बुरी तरह खदेड़कर धूल चटा दी, जिससे मुगलों के खेमे में भय व्याप्त हो गया। इसके पश्चात 16 मार्च 1527 को खानवा का ऐतिहासिक युद्ध हुआ। इस भीषण संग्राम में सांगा ने पारंपरिक युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया, लेकिन बाबर के बारूद और तोपखाने ने युद्ध की दिशा बदल दी। युद्धभूमि में सांगा का एक हाथ, एक पैर और एक आँख पहले ही विभिन्न संघर्षों में जा चुकी थी और खानवा में उनके शरीर पर 80 से अधिक गहरे घाव लगे, जिसके कारण उन्हें 'सैनिकों का भग्नावशेष' कहा जाने लगा। घायल अवस्था में अचेत होने पर उन्हें युद्धभूमि से सुरक्षित बाहर ले जाया गया, जहाँ उनके मित्र राजराणा अजा झाला ने उनका स्थान लिया और वीरगति प्राप्त की।
महाराणा सांगा का अंत भी उनके गौरवशाली जीवन की तरह ही मार्मिक रहा। जब वे पुनः संगठित होकर बाबर को भारत से बाहर निकालने की योजना बना रहे थे, तब उनके कुछ सामंतों ने, जो युद्ध की विभीषिका से भयभीत थे, उन्हें विष दे दिया। 30 जनवरी 1528 को भारत के इस महान 'हिंदुपत' का देहांत हो गया। सांगा ने न केवल विदेशी आक्रमणों से भारत की संस्कृति और सीमाओं की रक्षा की, बल्कि एक ऐसे अखंड राजपूताना की नींव रखी जिसने आगे चलकर महाराणा प्रताप जैसे योद्धाओं को प्रेरणा दी। उनका व्यक्तित्व हमें सिखाता है कि शरीर भले ही क्षत-विक्षत हो जाए, लेकिन यदि संकल्प अडिग हो तो व्यक्ति इतिहास के पन्नों में अमर हो जाता है। आज भी उनकी वीरता की गाथाएँ मेवाड़ की दीवारों और भारतीय जनमानस के हृदय में गर्व के साथ गूंजती हैं।

