17 जून को क्यों मनाई जा रही है महाराणा प्रताप जयंती? जानिए जन्म से जुड़ा रोचक सच
महाराणा प्रताप जयंती 2026 पर जानिए मेवाड़ के महान योद्धा महाराणा प्रताप का इतिहास, जन्म तिथि, सिसोदिया वंश से उनका संबंध, 1576 का प्रसिद्ध हल्दीघाटी युद्ध, मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए उनका संघर्ष और कला-संस्कृति के संरक्षण में उनका योगदान। 17 जून को मनाई जा रही 486वीं जयंती का महत्व विस्तार से पढ़ें।

महाराणा प्रताप जयंती
भारत के इतिहास में कुछ ऐसे नाम हैं जो केवल शासक नहीं बल्कि साहस, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति के जीवंत प्रतीक बन जाते हैं। मेवाड़ के महान योद्धा महाराणा प्रताप ऐसा ही एक नाम हैं, जिनकी वीरता की गाथाएं आज भी देशवासियों को प्रेरित करती हैं। वर्ष 2026 में महाराणा प्रताप जयंती 17 जून को मनाई जा रही है, जो उनकी 486वीं जयंती के रूप में देशभर में श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई जा रही है। इस अवसर पर विभिन्न राज्यों में सांस्कृतिक कार्यक्रम, श्रद्धांजलि सभाएं और ऐतिहासिक चर्चाएं आयोजित की जा रही हैं।
महाराणा प्रताप का जन्म मेवाड़ के महाराणा उदय सिंह द्वितीय और महारानी जयवंता बाई के यहां वर्ष 1540 में हुआ था। इतिहासकारों के अनुसार जूलियन कैलेंडर के अनुसार उनका जन्म 9 मई 1540 को हुआ था। वहीं प्रोलेप्टिक ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार यह तिथि 19 मई 1540 मानी जाती है। हालांकि उनकी जयंती का उत्सव हिन्दू पंचांग के आधार पर मनाया जाता है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार महाराणा प्रताप का जन्म विक्रम संवत 1597 में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हुआ था, जिसके कारण वर्ष 2026 में यह तिथि 17 जून को पड़ रही है।
महाराणा प्रताप सिसोदिया राजवंश से संबंध रखते थे और मेवाड़ के शाही परिवार के गौरवशाली उत्तराधिकारी थे। उनके भाईयों में शक्ति सिंह, विक्रम सिंह और जगमाल सिंह शामिल थे, जबकि उनकी दो सौतेली बहनें चांद कंवर और मान कंवर थीं। उनकी प्रमुख पत्नी अजबदे बाई पंवार थीं, जिनसे उनके ज्येष्ठ पुत्र अमर सिंह प्रथम का जन्म हुआ।
वर्ष 1572 में महाराणा उदय सिंह के निधन के बाद मेवाड़ के उत्तराधिकार को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। रानी धीर बाई भटियानी अपने पुत्र जगमाल को उत्तराधिकारी बनाना चाहती थीं, लेकिन मेवाड़ के वरिष्ठ सरदारों और दरबारियों ने परंपरा और योग्यता के आधार पर महाराणा प्रताप का समर्थन किया। अंततः प्रताप को मेवाड़ का 54वां शासक घोषित किया गया और होली के शुभ अवसर पर गोगुंदा में उनका राज्याभिषेक किया गया। दूसरी ओर, जगमाल ने असंतोष व्यक्त करते हुए मुगल सम्राट अकबर का साथ स्वीकार कर लिया।
महाराणा प्रताप का नाम भारतीय इतिहास में सबसे अधिक हल्दीघाटी के युद्ध के कारण स्मरण किया जाता है। वर्ष 1576 में उन्होंने मुगल सम्राट अकबर की विशाल सेना के विरुद्ध हल्दीघाटी में भीषण युद्ध लड़ा। यद्यपि यह युद्ध निर्णायक विजय में परिवर्तित नहीं हो सका, लेकिन महाराणा प्रताप ने कभी भी मुगल सत्ता के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं किया। सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने मेवाड़ की स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखा। यही कारण है कि उन्हें भारतीय इतिहास में अदम्य साहस और अटल स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
महाराणा प्रताप केवल एक महान योद्धा ही नहीं थे, बल्कि कला और संस्कृति के संरक्षक भी थे। उनके शासनकाल में चावंड मेवाड़ की राजधानी बना, जहां अनेक कवियों, कलाकारों, लेखकों और शिल्पकारों को संरक्षण मिला। इसी दौर में प्रसिद्ध ‘चावंड कला शैली’ का विकास हुआ, जिसने राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान दी। उनके दरबार में कलाकार नासिरुद्दीन जैसे प्रतिभाशाली व्यक्तित्व भी मौजूद थे, जो उस समय के सांस्कृतिक उत्थान का प्रमाण माने जाते हैं।
राजस्थान सहित देश के कई हिस्सों में आज भी महाराणा प्रताप को वीरता और राष्ट्रगौरव के प्रतीक के रूप में स्मरण किया जाता है। अनेक राजपूत परिवारों में उनकी पूजा-अर्चना की जाती है और उनकी जीवनगाथा आने वाली पीढ़ियों को साहस, आत्मसम्मान और मातृभूमि के प्रति समर्पण का संदेश देती है। महाराणा प्रताप जयंती केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व की जन्मतिथि का स्मरण नहीं है, बल्कि यह उस अदम्य संकल्प, स्वतंत्रता की भावना और स्वाभिमान का उत्सव है जिसने भारतीय इतिहास को नई दिशा दी। सदियों बाद भी महाराणा प्रताप का नाम संघर्ष, सम्मान और राष्ट्रभक्ति की अमर मिसाल के रूप में देशवासियों के हृदय में जीवित है।

Manyaa Chaudhary
यह 'प्रातःकाल' में एसोसिएट एडिटर के पद पर हैं। और पिछले दो वर्षों से इन्हें रिपोर्टिंग और इवेंट मैनेजमेंट का अनुभव है। इससे पहले इन्होंने 'स्वदेश न्यूज़ चैनल' में बतौर ट्रेनी रिपोर्टर काम किया है। ये विशेष रूप में मनोरंजन, स्पोर्ट्स, और क्राइम रिपोर्टिंग क्षेत्र में समर्थ हैं। अभी यह जर्नलिज्म की पढाई कर रही हैं।
