अठारहवीं शताब्दी के भारतीय इतिहास के पटल पर महाराजा सूरजमल एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र की भांति उभरे, जिन्होंने अपनी राजनीतिक चतुरता, अदम्य साहस और दूरदर्शी सोच से न केवल भरतपुर रियासत को एक स्वतंत्र शक्ति बनाया, बल्कि मुगलों और अफगानों के दौर में हिंदू अस्मिता को नई ऊर्जा भी प्रदान की। 13 फरवरी 1707 को राजा बदन सिंह और रानी देवकी के आंगन में जन्मे सूरजमल ने अपनी विलक्षण बुद्धि और सैन्य कौशल के कारण समकालीन इतिहासकारों से 'जाट जाति का प्लेटो' और आधुनिक लेखकों से 'जाट यूलिसिस' जैसी उपाधियां प्राप्त कीं। उनका जीवन केवल युद्धों की जीत तक सीमित नहीं था, बल्कि वे एक कुशल वास्तुकार और रणनीतिकार भी थे, जिसका प्रमाण उनके द्वारा बनाया गया 'लोहागढ़ दुर्ग' है, जिसे अपनी अभेद्यता के कारण 'लौह किला' कहा गया और जिसे कई हमलों के बावजूद अंग्रेज भी जीतने में विफल रहे।

महाराजा सूरजमल का राजनीतिक सफर चंदास के युद्ध से शुरू हुआ, जहाँ उन्होंने अपनी स्वतंत्र सैन्य सूझबूझ का परिचय देते हुए मुगल सेना को पराजित किया। उनके नेतृत्व में भरतपुर राज्य का विस्तार आज के आगरा, मथुरा, अलीगढ़, मेरठ से लेकर हरियाणा के रोहतक और झज्जर तक फैल गया था। जयपुर के उत्तराधिकार संघर्ष में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही, जहाँ उन्होंने ईश्वरी सिंह का साथ देकर अपनी कूटनीतिक जीत दर्ज की। दिल्ली की राजनीति में भी उनका दबदबा ऐसा था कि 1753 में उन्होंने दिल्ली पर विजय प्राप्त की और बाद में आगरा के ऐतिहासिक किले पर अधिकार कर अपनी शक्ति का लोहा मनवाया। उनके पास 75,000 से अधिक पैदल सैनिकों और 38,000 घुड़सवारों की विशाल अनुशासित सेना थी, जो उस समय के किसी भी बड़े साम्राज्य को चुनौती देने के लिए पर्याप्त थी।

सूरजमल की महानता उनके संयम में भी झलकती है। जब अहमद शाह अब्दाली जैसे आक्रमणकारी ने भारत पर हमला किया, तब सूरजमल ने अत्यंत विनम्रता और कूटनीति के साथ अपनी स्थिति को सुरक्षित रखा, जबकि उनके किले किसी भी बड़े हमले को झेलने के लिए तैयार थे। कुम्हेर के घेरे के दौरान उन्होंने मल्हार राव होलकर जैसे दिग्गज मराठा सेनापति को संधि करने पर मजबूर कर दिया था। उनकी दृष्टि केवल साम्राज्य विस्तार तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने डीग के भव्य महलों जैसे शानदार ग्रीष्मकालीन आवासों का निर्माण कर कला और वैभव को भी प्रश्रय दिया।

जीवन के अंतिम पड़ाव पर, जब नजीब-उद-दौला के नेतृत्व में रोहिल्ला अफगानों के साथ युद्ध अनिवार्य हो गया, तब सूरजमल अपनी विशाल सेना के साथ विजय की ओर अग्रसर थे। किंतु, 25 दिसंबर 1763 की सर्द रात को हिंडन नदी के तट पर हुए एक दुर्भाग्यपूर्ण घात (Ambush) में यह महान योद्धा वीरगति को प्राप्त हुआ। भले ही उनका पार्थिव शरीर शांत हो गया, लेकिन उनका गौरवशाली इतिहास आज भी कुसुम सरोवर की छतरियों और लोहागढ़ की दीवारों में जीवंत है। महाराजा सूरजमल का जीवन हमें सिखाता है कि अडिग संकल्प और स्पष्ट दृष्टि से एक छोटी सी रियासत को भी साम्राज्य की गरिमा दी जा सकती है। उनकी विरासत आज भी भरतपुर ब्रज विश्वविद्यालय और विभिन्न संस्थानों के रूप में राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे रही है।

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