कौन थे महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय? मरुधरा के वो महान खगोलशास्त्री और दूरदर्शी शासक जिन्होंने विज्ञान और साहस से रचा जयपुर का स्वर्णिम इतिहास।
आमेर के शासक सवाई जयसिंह द्वितीय ने विज्ञान, वास्तुकला और कूटनीति के संगम से जयपुर शहर और जंतर-मंतर जैसी ऐतिहासिक विरासतों का निर्माण किया।

3 नवंबर 1688 को आमेर की वीर प्रसूता भूमि पर जन्मे महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय भारतीय इतिहास के उन विरल व्यक्तित्वों में से हैं, जिन्होंने तलवार की धार और बुद्धि के कौशल के बीच एक अद्भुत संतुलन स्थापित किया। मात्र 11 वर्ष की अल्पायु में अपने पिता मिर्जा राजा बिशन सिंह के निधन के पश्चात 31 दिसंबर 1699 को आमेर की गद्दी पर बैठने वाले जयसिंह को विरासत में एक ऐसा राज्य मिला था जिसकी आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय थी और सैन्य संसाधन सीमित थे। दिल्ली और आगरा जैसे मुगल शक्ति केंद्रों के निकट होने के कारण उनकी शुरुआती राजनीति कूटनीति और धैर्य की रही। मुगल सम्राट औरंगजेब ने दक्षिण के युद्धों में उनकी वीरता और बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर उन्हें 'सवाई' की उपाधि दी थी, जिसका अर्थ है अपने समकालीनों से 'सवा गुना' श्रेष्ठ। हालांकि, औरंगजेब की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के संघर्षों और मुगलों की बदलती नीतियों के कारण उन्हें कई बार सिंहासन से हाथ धोना पड़ा और अपमान भी सहना पड़ा, लेकिन उन्होंने मारवाड़ और मेवाड़ के साथ रणनीतिक गठबंधन कर न केवल अपना खोया हुआ राज्य वापस पाया, बल्कि मुगलों के प्रभुत्व को चुनौती देते हुए अपनी संप्रभुता घोषित की।
जयसिंह केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि एक युगद्रष्टा वैज्ञानिक और वास्तुकार भी थे। जब मुगलों की शक्ति क्षीण हो रही थी और देश में राजनीतिक अस्थिरता थी, तब उन्होंने 1727 में आमेर की पहाड़ियों से निकलकर एक आधुनिक और नियोजित शहर 'जयपुर' की नींव रखी। विद्याधर भट्टाचार्य के निर्देशन में प्राचीन शिल्प-शास्त्रों और ग्रिड पद्धति पर आधारित यह शहर उस समय के विश्व के सबसे व्यवस्थित नगरों में से एक बना। उनकी बौद्धिक जिज्ञासा का स्तर इतना ऊंचा था कि उन्होंने गणित, खगोल विज्ञान और साहित्य में गहरी पैठ बनाई। उन्होंने यूक्लिड की 'एलिमेंट्स ऑफ ज्योमेट्री' और जॉन नेपियर के लघुगणक (Logarithms) जैसे जटिल ग्रंथों का संस्कृत में अनुवाद कराया ताकि भारतीय विद्वान आधुनिक ज्ञान से जुड़ सकें। खगोल विज्ञान के प्रति उनका प्रेम इस कदर था कि उन्होंने दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में पांच विशाल वेधशालाओं—जंतर मंतर—का निर्माण कराया। उनके द्वारा तैयार की गई खगोलीय सारणी 'जीज-ए-मुहम्मदशाही' आज भी उनकी सटीकता का प्रमाण है।
सैन्य दृष्टि से जयसिंह ने युद्ध कला में क्रांतिकारी बदलाव किए। उन्होंने पारंपरिक तलवार-ढाल के स्थान पर अपने सैनिकों को आधुनिक माचलोक (बंदूकों) से लैस किया और तोपखाने पर विशेष बल दिया। उनके द्वारा निर्मित 'जयवाण' तोप आज भी पहियों पर रखी दुनिया की सबसे बड़ी तोप मानी जाती है। प्रशासनिक रूप से उन्होंने हिंदू समाज में व्याप्त कुरीतियों जैसे सती प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाई और राजपूत विवाहों में होने वाले फिजूलखर्च को कम करने का प्रयास किया। उनके कूटनीतिक प्रयासों का ही परिणाम था कि मुगल सम्राट मुहम्मद शाह ने हिंदुओं पर लगने वाले जजिया और गया में तीर्थयात्री कर को समाप्त किया। अपने जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने अश्वमेध और वाजपेय जैसे प्राचीन वैदिक यज्ञों को पुनर्जीवित कर अपनी स्वतंत्र सत्ता और धार्मिक निष्ठा का उद्घोष किया।
21 सितंबर 1743 को महाराजा जयसिंह का निधन हुआ, लेकिन वे अपने पीछे एक ऐसा सांस्कृतिक और वैज्ञानिक वैभव छोड़ गए जो आज भी जयपुर की गुलाबी दीवारों और जंतर-मंतर के यंत्रों में जीवित है। वे अठारहवीं सदी के भारत के सबसे प्रबुद्ध और आधुनिक सोच वाले राजा थे, जिन्होंने यह सिद्ध किया कि एक शासक केवल युद्धों से नहीं बल्कि अपने ज्ञान, कला-प्रेम और जनकल्याणकारी विजन से अमर होता है। उनकी विरासत आज भी राजस्थान के गौरव और भारतीय विज्ञान के स्वर्णिम अध्याय के रूप में पूरी दुनिया को प्रेरित करती है।

