कौन थे महाराजा अनूप सिंह? बीकानेर के वह प्रतापी शासक जिन्होंने दक्षिण विजय से लेकर साहित्य संवर्धन तक इतिहास में स्वर्णिम अध्याय लिखा।
औरंगजेब से 'माही मरातिब' पाने वाले महाराजा अनूप सिंह ने सैन्य कौशल के साथ दुर्लभ संस्कृत ग्रंथों और कला का संरक्षण कर इतिहास में अमूल्य योगदान दिया।

राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि के इतिहास में बीकानेर के महाराजा अनूप सिंह एक ऐसे विरले व्यक्तित्व के रूप में उभरते हैं, जिन्होंने तलवार की धार और कलम की स्याही, दोनों से ही अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की। वर्ष 1638 में जन्मे अनूप सिंह बीकानेर के शासक राव करण सिंह के ज्येष्ठ पुत्र थे और उनके जीवन का अधिकांश भाग मुगल साम्राज्य की सेवा और दक्षिण भारत के सैन्य अभियानों में व्यतीत हुआ। जुलाई 1667 में औरंगजेब ने उन्हें उनके पिता के जीवनकाल में ही उत्तराधिकार का अधिकार प्रदान कर दिया था, जिसके पश्चात 1669 में औरंगजेब के दक्षिण अभियान के दौरान औरंगाबाद में करण सिंह के देहावसान के बाद उन्होंने विधिवत बीकानेर की राजगद्दी संभाली। अनूप सिंह केवल एक शासक ही नहीं, बल्कि एक कुशल कूटनीतिज्ञ और साहसी सेनापति थे, जिनकी वीरता का लोहा स्वयं मुगल बादशाह औरंगजेब भी मानता था। उनके सैन्य कौशल का सबसे उज्ज्वल प्रमाण 1680 और 1690 के दशकों में देखने को मिला, जब उन्होंने मराठा शासक शिवाजी के विरुद्ध महाबत खान के अधीनस्थ अभियान में भाग लिया और बाद में 1687 में गोलकुंडा सल्तनत पर विजय प्राप्त करने में मुगल सेना का नेतृत्व किया। उनकी इस अभूतपूर्व सफलता से प्रसन्न होकर औरंगजेब ने उन्हें 'महाराजा' की उपाधि से विभूषित किया और उनके 'मनसब' को बढ़ाकर 5000 तक कर दिया। साथ ही, उन्हें प्रतिष्ठित शाही सम्मान 'माही मरातिब' प्रदान किया गया, जो उनकी सैन्य उपलब्धियों की पराकाष्ठा थी।
महाराजा अनूप सिंह का व्यक्तित्व युद्ध क्षेत्र तक ही सीमित नहीं था, बल्कि वे कला, संगीत और साहित्य के अनन्य उपासक भी थे। वे स्वयं एक विद्वान और संगीतज्ञ थे, जिनकी विद्वता उनके द्वारा रचित 'अनूपविवेक', 'कामप्रबोध', 'श्राद्धप्रयोग चिंतामणि' और गीत गोविंद पर आधारित 'अनूपोदय' टीका में स्पष्ट झलकती है। उनके दरबार में भाव भट्ट जैसे दिग्गज संगीतज्ञों और मनी राम तथा अनंत भट्ट जैसे विद्वानों को संरक्षण प्राप्त था, जिन्होंने 'अनूप संगीत रत्नाकर' और 'तीर्थ रत्नाकर' जैसे अमर ग्रंथों की रचना की। अनूप सिंह का साहित्य प्रेम इतना गहरा था कि उन्होंने संस्कृत के कई कठिन ग्रंथों का राजस्थानी में अनुवाद करवाया, जिनमें 'शुक कारिका' (दपत विनोद), 'वेताल पचीसी' और आनंद राम द्वारा अनूदित 'श्रीमद्भागवत गीता' प्रमुख हैं। जब वे दक्षिण भारत के सैन्य अभियानों पर थे, तब उन्होंने अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए विनाश के कगार पर खड़े असंख्य दुर्लभ ग्रंथों और मूर्तियों को संरक्षित किया। उन्होंने न केवल महाराणा कुंभा के संगीत ग्रंथों के पूरे संग्रह को सहेजा, बल्कि दक्षिण से लाए गए पांडुलिपियों के विशाल भंडार से बीकानेर में प्रसिद्ध 'अनूप लाइब्रेरी' की स्थापना की, जो आज भी दुर्लभ ग्रंथों का अनमोल खजाना है। उनके काल में ही बीकानेर की विशिष्ट चित्रकला शैली 'बीकानेर कलम' का उदय हुआ, जिसने भारतीय कला जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाई। इसके अतिरिक्त, उनके द्वारा एकत्रित की गई दिव्य मूर्तियों का संग्रह आज भी बीकानेर के 'तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं के मंदिर' में सुरक्षित है।
महाराजा अनूप सिंह का जीवन एक ऐसे महानायक की गाथा है जिसने युद्ध के कोलाहल के बीच भी सरस्वती की साधना को कभी मंद नहीं पड़ने दिया। एक पराक्रमी योद्धा के रूप में उन्होंने बीकानेर की प्रतिष्ठा को दक्षिण के दुर्गों तक पहुँचाया, तो एक संरक्षक के रूप में भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर को विलुप्त होने से बचाकर उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित कर दिया। उनकी विरासत आज भी बीकानेर के पुस्तकालयों, मंदिरों और कला के नमूनों में जीवित है, जो उन्हें मध्यकालीन भारत के सबसे विद्वान और पराक्रमी शासकों की श्रेणी में अग्रगण्य बनाती है।

