राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि ने इतिहास के हर कालखंड में ऐसे नायकों को जन्म दिया है जिन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा और स्वाधीनता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, और इन्हीं महान विभूतियों में सीकर के रींगस में वर्ष 1804 में जन्मे लोटू निठारवाल का नाम अत्यंत गौरव और श्रद्धा के साथ लिया जाता है। लोटू जी का व्यक्तित्व अदम्य साहस, शारीरिक शक्ति और प्रखर राष्ट्रवाद का अद्भुत मिश्रण था; लगभग 6 फीट 11 इंच की सुडौल काया और 160 किलो वजन के साथ वे एक ऐसे योद्धा थे जिनसे ब्रिटिश हुकूमत भी थर-थर कांपती थी। उनका प्रारंभिक जीवन संघर्षपूर्ण रहा और बचपन में ही उन्होंने सामंती उत्पीड़न का डटकर विरोध किया, जिसका प्रमाण तब मिला जब उन्होंने आत्मसम्मान की रक्षा हेतु रींगस के ठाकुर के पुत्र द्वारा किए गए दुर्व्यवहार का मुंहतोड़ जवाब दिया और इस संघर्ष के बाद उन्हें अपने परिवार के साथ बाठोठ गाँव में शरण लेनी पड़ी। बाठोठ में रहते हुए उनकी भेंट प्रसिद्ध क्रांतिकारी डूंगजी और जवाहरजी से हुई, जिनके साथ मिलकर उन्होंने विदेशी सत्ता के विरुद्ध एक व्यापक सशस्त्र विद्रोह की नींव रखी। लोटू निठारवाल केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि एक न्यायप्रिय जननायक भी थे जिन्हें आज भी सीकर के ग्रामीण क्षेत्रों में 'चीफ जस्टिस' के रूप में याद किया जाता है, क्योंकि वे स्थानीय विवादों का निपटारा अत्यंत निष्पक्षता और सूझबूझ से करते थे। उनके जीवन का सबसे साहसिक अध्याय तब शुरू हुआ जब अंग्रेजों ने डूंगजी को बंदी बनाकर आगरा के अभेद्य किले में कैद कर दिया, जिसे भेदना उस समय असंभव माना जाता था। लोटू निठारवाल ने अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए बालू नाई, सांखू लोहार और करणा मीणा जैसे विश्वसनीय साथियों के साथ मिलकर एक अनोखी योजना बनाई और साधु का वेश धरकर किले की रेकी की। इसके पश्चात उन्होंने एक बारात का स्वांग रचाकर अंग्रेजों की सतर्क आंखों में धूल झोंकी और 11 दिसंबर 1846 को आगरा किले पर अचानक आक्रमण कर न केवल डूंगजी को मुक्त कराया, बल्कि वहां कैद 300 अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को भी छुड़ाकर ब्रिटिश प्रशासन की चूलें हिला दीं। इस घटना ने भारतीय क्रांतिकारियों में एक नए आत्मविश्वास का संचार किया और इसके तुरंत बाद उन्होंने नसीराबाद छावनी पर हमला बोलकर अंग्रेजों के खजाने को लूटा और उस धन को गरीबों व जरूरतमंदों में बांट दिया, जिससे वे लोकगीतों के अमर नायक बन गए। लोटू जी के भीतर पर्यावरण के प्रति भी गहरी संवेदनशीलता थी, जिसका उदाहरण बाठोठ में उनके द्वारा बचाया गया वह खेजड़ी का वृक्ष है जो आज भी उनकी स्मृतियों को संजोए खड़ा है। दुर्भाग्यवश, यह महान राष्ट्रभक्त किसी विदेशी सैनिक से नहीं बल्कि 1855 में अपनों के ही एक षड्यंत्र का शिकार होकर वीरगति को प्राप्त हुआ, परंतु उनके द्वारा जलाई गई क्रांति की मशाल ने ही 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के लिए शेखावाटी की धरती को तैयार किया। लोटू निठारवाल का बलिदान आज भी राजस्थान की 'फड़ों' और लोकगीतों में जीवित है, जो हमें याद दिलाता है कि स्वाभिमान के लिए मर-मिटने वाले नायक कभी इतिहास के पन्नों से ओझल नहीं होते।

लोटू निठारवाल का जीवन केवल एक क्रांतिकारी की गाथा नहीं है, बल्कि यह अन्याय के विरुद्ध खड़े होने और जन-कल्याण के लिए समर्पित रहने की एक शाश्वत प्रेरणा है, जिसकी विरासत आज भी शेखावाटी की मिट्टी में रची-बसी है और आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाती रहेगी।

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