कौन थे वासुपूज्य जी? जैन धर्म के बारहवें तीर्थंकर और चंपापुरी के महान त्यागी
इक्ष्वाकु वंश में जन्मे भगवान वासुपूज्य ने चंपापुरी में कठोर तपस्या के बाद केवल ज्ञान और मोक्ष प्राप्त किया था, जिनका जीवन पूर्ण ब्रह्मचर्य का प्रतीक है।

इक्ष्वाकु वंश के गौरव और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले भगवान वासुपूज्य जी का जीवन त्याग, वैराग्य और आत्म-कल्याण की एक अद्भुत गाथा है।
जैन धर्म की गौरवशाली परंपरा में वर्तमान अवसर्पिणी काल के बारहवें तीर्थंकर के रूप में भगवान वासुपूज्य जी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और वंदनीय है। भारतीय कालगणना के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के पावन दिन चंपापुरी की पावन धरा पर इक्ष्वाकु वंश के राजा वासुपूज्य और माता जया देवी के आंगन में उनका अवतरण हुआ। उनके व्यक्तित्व की महानता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने सांसारिक सुखों और राजसी वैभव के स्थान पर आत्मिक शांति को चुना और आजीवन अविवाहित रहकर पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन किया। जैन ग्रंथों के अनुसार, वासुपूज्य जी का कद 70 धनुष था और उन्होंने 72 लाख पूर्व का लंबा जीवन व्यतीत किया, जो उनके असाधारण और दिव्य प्रभाव को दर्शाता है। उनके पूर्ववर्ती तीर्थंकर श्रेयांसनाथ जी के निर्वाण के 54 सागर बाद उनका जन्म हुआ था, और उनके बाद विमलनाथ जी का जन्म 30 सागर के अंतराल पर हुआ। उनके प्रति अटूट श्रद्धा रखने वालों में दूसरे वासुदेव द्विपृष्ठ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है, जिन्होंने अपने भाई बलदेव श्रीविजय के साथ मिलकर अत्याचारी प्रतिवासुदेव तर्क का अंत किया था। कालांतर में श्रीविजय ने भी भगवान वासुपूज्य के चरणों में दीक्षा ग्रहण कर ली थी। वासुपूज्य जी के जीवन का सबसे प्रेरणादायक पहलू उनकी कठिन तपस्या रही; उन्होंने दीक्षा लेने के मात्र एक माह के भीतर ही केवल ज्ञान प्राप्त कर लिया, जो उनकी एकाग्रता और आत्मिक शुद्धि का प्रमाण है। अंततः आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी के दिन बिहार के चंपापुरी (भागलपुर) में उन्होंने मोक्ष प्राप्त कर सिद्ध पद प्राप्त किया और समस्त कर्मों का क्षय कर एक मुक्त आत्मा बन गए।
आज भी भगवान वासुपूज्य जी की विरासत भक्तों के हृदय और भव्य मंदिरों में जीवंत है। केरल के एलेप्पी और एर्नाकुलम से लेकर लुधियाना के आत्म वल्लभ जनपथ तक उनके समर्पित मंदिर उनकी शिक्षाओं का प्रसार कर रहे हैं। विशेष रूप से चंपापुरी का नाथनगर मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र है, जहाँ साल 2014 में उनकी 31 फीट ऊंची विशाल प्रतिमा स्थापित की गई, जो वर्तमान में उनकी सबसे ऊंची प्रतिमा मानी जाती है। श्रीमती सोना देवी सेठी चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा निर्मित यह प्रतिमा उनके महान जीवन और जैन धर्म के प्रति उनके योगदान की निरंतर याद दिलाती रहती है। भगवान वासुपूज्य का जीवन हमें यह सिखाता है कि इंद्रियों पर विजय और वैराग्य ही वह मार्ग है जो मनुष्य को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर शाश्वत सुख की ओर ले जा सकता है।

