अध्यात्म और आत्मिक शुद्धि के मार्ग पर चलने वाले मुमुक्षुओं के लिए भगवान श्रेयांसनाथ एक दिव्य प्रकाश स्तंभ के समान हैं।

जैन धर्म की समृद्ध और प्राचीन परंपरा में ग्यारहवें तीर्थंकर के रूप में अवतरित भगवान श्रेयांसनाथ का जीवन त्याग, तपस्या और आत्म-साक्षात्कार की एक विलक्षण गाथा है। वाराणसी के निकट सारनाथ के पावन स्थल सिंहपुरी में इक्ष्वाकु वंशीय राजा विष्णु और रानी विष्णो के आंगन में फाल्गुन कृष्ण द्वादशी को आपका जन्म हुआ, जिसने इस धरा को कृतार्थ कर दिया। अस्सी धनुष की विशाल काया और चौरासी लाख वर्षों के लंबे जीवन काल वाले इस महापुरुष का व्यक्तित्व शांति और संयम का जीवंत उदाहरण था। अपने पूर्ववर्ती तीर्थंकर शीतलनाथ जी के निर्वाण के पश्चात एक लंबे अंतराल के बाद जब मानवता पुनः आध्यात्मिक संशय के घेरे में थी, तब श्रेयांसनाथ जी ने अपने ज्ञान के आलोक से संसार को दिशा प्रदान की। उन्होंने राजसी सुखों का त्याग कर दीक्षा ग्रहण की और कठोर तप के माध्यम से केवलज्ञान प्राप्त किया, जिसके पश्चात उनकी 'देशना' यानी दिव्य उपदेशों ने असंख्य साधुओं, साध्वियों और श्रावकों को मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर किया।

भगवान श्रेयांसनाथ के दर्शन का मुख्य केंद्र 'निर्जरा' का सिद्धांत रहा, जो आत्मा से संचित कर्मों को अलग करने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। उन्होंने अत्यंत सूक्ष्मता से समझाया कि कर्मों का संचय और उनका क्षय निरंतर चलने वाली प्रक्रियाएँ हैं, लेकिन मोक्ष की प्राप्ति के लिए 'सकाम निर्जरा' अनिवार्य है। उनके अनुसार, एक आत्म-साक्षात्कारी व्यक्ति वही है जो पूर्ण जागरूकता के साथ केवल ज्ञाता और दृष्टा भाव में रहकर नए कर्मों के बंधन को रोकता है। इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए उन्होंने 'तप' की महिमा का गान किया और इसे बाह्य तथा आंतरिक दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया। अनशन, ऊनोदरी और कायोत्सर्ग जैसे बाह्य तपों को उन्होंने शरीर और इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने का साधन बताया, तो वहीं प्रायश्चित, वैयावृत्य, स्वाध्याय और ध्यान जैसे आंतरिक तपों को कर्मों को जड़ से मिटाने का वास्तविक मार्ग घोषित किया। उनकी दृष्टि में जब कोई साधक अपने दोषों के लिए हृदय से प्रायश्चित करता है और संसार के समस्त जीवों को निर्दोष मानकर समभाव रखता है, तभी वह वास्तविक स्वाधीनता की ओर बढ़ता है।

अपने जीवन के अंतिम काल में सम्मेद शिखरजी पर्वत की पवित्र चोटियों पर पहुँचकर उन्होंने घोर तपस्या की और अंततः अपनी समस्त कर्म-शृंखलाओं को तोड़कर सिद्ध पद प्राप्त किया। आज भी सारनाथ स्थित उनका भव्य तीर्थ मंदिर उनके जन्म और वैराग्य की साक्षी दे रहा है, जहाँ भक्त उनके पदचिह्नों और आदर्शों की वंदना करते हैं। भगवान श्रेयांसनाथ का जीवन और उनकी शिक्षाएँ आज के अशांत युग में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, क्योंकि वे हमें सिखाती हैं कि वास्तविक विजय बाहरी दुनिया को जीतने में नहीं, बल्कि तप और विनय के माध्यम से स्वयं के भीतर छिपे कर्मों के अंधकार को मिटाने में है। उनकी विरासत केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह मोक्ष की अभिलाषा रखने वाली हर आत्मा के लिए एक शाश्वत मार्गदर्शिका है।

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