कौन थे संभवनाथ? जैन धर्म के तृतीय तीर्थंकर और शांति व संयम के शाश्वत प्रतीक
इक्ष्वाकु वंश के राजकुमार से जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर बनने तक का सफर, जानें भगवान संभवनाथ के जीवन, तप और मोक्ष की पूरी कहानी।

अटूट श्रद्धा और अध्यात्म के शिखर, भगवान संभवनाथ का जीवन दर्शन मानवता के लिए कल्याण का वह मार्ग है जो अनंत काल से प्रकाशित है।
जैन धर्म की समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा में वर्तमान अवसर्पिणी काल के तृतीय तीर्थंकर के रूप में भगवान संभवनाथ का अवतरण मानवीय सभ्यता के लिए एक युगांतरकारी घटना मानी जाती है। श्रावस्ती की पावन धरा पर इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय परिवार में जन्मे संभवनाथ जी के पिता राजा जितारी और माता महारानी सुषेणा थीं। कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा के शुभ संयोग में जन्मे इस महापुरुष का प्रारंभिक जीवन राजसी सुख-सुविधाओं के बीच व्यतीत हुआ, किंतु उनका अंतर्मन सदैव सांसारिक मोह-माया से विरक्त रहा। स्वर्ण के समान कांतिमान देह और अश्व (घोड़े) के प्रतीक चिन्ह से पहचाने जाने वाले संभवनाथ जी ने युवावस्था में राजपाट के उत्तरदायित्वों का निर्वहन अत्यंत कुशलता और न्यायप्रियता से किया, लेकिन उनका वास्तविक उद्देश्य आत्म-कल्याण और जगत को दुखों से मुक्ति दिलाना था।
जीवन की नश्वरता का गहरा आभास होने पर उन्होंने मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा के दिन श्रावस्ती के सहेतु वन में दीक्षा ग्रहण की और कठोर तपस्या के मार्ग पर अग्रसर हो गए। कहा जाता है कि उन्होंने वर्षों तक मौन साधना और आत्म-चिंतन किया, जिसके परिणामस्वरूप कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को उन्हें उसी सहेतु वन में साल वृक्ष के नीचे केवल ज्ञान (अनंत ज्ञान) की प्राप्ति हुई। केवल ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात वे तीर्थंकर कहलाए और उन्होंने धर्म सभाओं के माध्यम से सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह का उपदेश दिया। उनके संघ में श्री चारुदत्त जी प्रथम गणधर बने और साध्वी श्यामा उनकी प्रथम शिष्या बनीं। 105 गणधरों के विशाल संघ का नेतृत्व करते हुए उन्होंने हज़ारों आत्माओं को मोक्ष का मार्ग प्रशस्त किया। उनके काल में अध्यात्म की वह धारा बही जिसने तत्कालीन समाज में व्याप्त कुरीतियों और अशांति को समाप्त कर प्रेम और भाईचारे की स्थापना की।
अपने जीवन के अंतिम चरण में भगवान संभवनाथ ने सम्मेद शिखरजी (झारखंड) की पावन पहाड़ियों पर प्रवास किया, जहाँ गहन ध्यान के माध्यम से उन्होंने अपने समस्त घातीय और अघातीय कर्मों का क्षय कर दिया। अंततः चैत्र शुक्ल षष्ठी के दिन उन्होंने इसी निर्वाण भूमि से मोक्ष प्राप्त किया और एक सिद्ध बुद्ध मुक्त आत्मा के रूप में अनंत काल के लिए प्रतिष्ठित हो गए। आज भी भगवान संभवनाथ का जीवन और उनकी शिक्षाएं हमें यह संदेश देती हैं कि संयम और पुरुषार्थ के बल पर कोई भी जीव अपनी आत्मा के सर्वोच्च स्वरूप को प्राप्त कर सकता है। उनकी अहिंसक विचारधारा और त्याग की महिमा न केवल जैन धर्मावलंबियों के लिए बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए शांति और मुक्ति का एक अमर प्रकाश स्तंभ बनी हुई है।

