कौन थे कुंथुनाथ जी? जैन धर्म के सत्रहवें तीर्थंकर और हस्तिनापुर के महान चक्रवर्ती सम्राट
इक्ष्वाकु वंश के राजा सूर्य और माता श्रीदेवी के पुत्र भगवान कुंथुनाथ की जीवन यात्रा, उनके वैराग्य धारण करने की कथा और सम्मेद शिखरजी पर मोक्ष प्राप्ति का विवरण।

इक्ष्वाकु वंश के गौरव और आध्यात्मिक शांति के प्रतीक भगवान कुंथुनाथ की जीवन गाथा मानवता को त्याग और वैराग्य का शाश्वत संदेश देती है।
भारतीय काल गणना के अनुसार वर्तमान अवसर्पिणी काल के सत्रहवें तीर्थंकर, छठे चक्रवर्ती और बारहवें कामदेव के रूप में अवतरित भगवान कुंथुनाथ का जन्म उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक नगर हस्तिनापुर में इक्ष्वाकु वंश के राजा सूर्य (सुर) और माता श्रीदेवी के यहाँ वैशाख कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को हुआ था। उनके नाम का अर्थ 'रत्नों का ढेर' माना जाता है, जो उनके व्यक्तित्व की बहुमूल्य आभा को दर्शाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, उनका जन्म ईसा पूर्व 27,695,000 वर्ष पहले हुआ था और उनका कद 35 धनुष बताया गया है। एक प्रतापी चक्रवर्ती सम्राट के रूप में उन्होंने समस्त भूमि पर विजय प्राप्त की और अपनी शक्ति का लोहा मनवाया, किंतु उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब वे अपनी विजय को अमर करने के लिए पर्वतों की तलहटी में अपना नाम अंकित करने पहुँचे। वहाँ पहले से ही कई महान चक्रवर्तियों के नाम उत्कीर्ण देखकर उन्हें अपनी सांसारिक महत्वाकांक्षाओं की तुच्छता का बोध हुआ और उनका हृदय वैराग्य की ओर मुड़ गया। इस वैचारिक परिवर्तन ने उन्हें सिंहासन त्यागने और तपस्या के कठिन मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। अपने पूर्ववर्ती भगवान शांतिनाथ के लगभग आधा पल्य बाद अवतरित हुए कुंथुनाथ ने कठोर आत्म-अनुशासन के माध्यम से अपनी आत्मा को कर्मों के बंधन से मुक्त किया। 95,000 वर्ष की आयु में उन्होंने सम्मेद शिखरजी (माउंट शिखरजी) पर निर्वाण प्राप्त कर सिद्ध पद प्राप्त किया। उनके आध्यात्मिक प्रभाव और विरासत को आज हस्तिनापुर के प्राचीन बड़ा मंदिर, हम्पी के गणिगिट्टी जैन मंदिर और जैसलमेर किले के कुंथुनाथ मंदिर जैसे पवित्र स्थलों के रूप में देखा जा सकता है, जहाँ भक्त आज भी उनके सत्य और संयम के मार्ग का अनुसरण करते हैं।
भगवान कुंथुनाथ का जीवन सत्ता से सत्य की ओर और विजय से विवेक की ओर जाने की एक प्रेरणादायक यात्रा है, जो सदियों बाद भी हमें यह सिखाती है कि वास्तविक महानता साम्राज्य विस्तार में नहीं बल्कि स्वयं पर विजय प्राप्त कर मोक्ष की प्राप्ति करने में निहित है।

