कौन थे भगवान देवनारायण? अत्याचार के विरुद्ध क्रांति और गौ-सेवा के प्रतीक लोकदेवता की गौरवशाली गाथा
राजस्थान के लोकदेवता भगवान देवनारायण का जीवन परिचय, समाज सुधार में योगदान और अत्याचार के विरुद्ध उनके धर्मयुद्ध का ऐतिहासिक विवरण।

राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि पर अवतरित भगवान देवनारायण केवल एक ऐतिहासिक शासक और महान योद्धा ही नहीं थे, बल्कि वे समाज सुधारक और आध्यात्मिक शक्ति के पुंज भी थे, जिन्हें आज राजस्थान, हरियाणा और मध्य प्रदेश में भगवान विष्णु के अवतार के रूप में पूजा जाता है। उनका जन्म अजमेर के निकट नाग पहाड़ के मूल निवासी मंडलजी गुर्जर के वंश में हुआ था, जो न केवल प्रसिद्ध मंडल झील के निर्माता थे बल्कि उनके परिवार का संबंध अजमेर के शासक राजा बीसलदेव चौहान से भी था, जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से अरब आक्रमणों का प्रतिरोध किया था। लोकगाथाओं के अनुसार, मंडलजी के पुत्र बागजी के चौबीस पुत्रों में सबसे बड़े राजा सवाई भोज गुर्जर और माता साडू गुर्जरी के आंगन में विक्रम संवत 968 (911 ईस्वी) में माघ शुक्ल सप्तमी को भगवान देवनारायण का अवतार मालासेरी में हुआ। उनका जीवन संघर्ष और जन-कल्याण की एक अनूठी मिसाल है, जिसकी शुरुआत तब हुई जब रानी जयमती को लेकर बागरावत भाइयों और राणा के राजा दुर्जनसाल के बीच भीषण युद्ध हुआ। इस धर्मयुद्ध में बागरावतों ने अपने वचन की मर्यादा रखते हुए बलिदान दिया, जिसके उपरांत देवनारायण ने प्रकट होकर अत्याचारी राजा दुर्जनसाल का अंत किया और धर्म की पुनर्स्थापना की। धारा के राजा की पुत्री पीपलदे परमार और नागकन्या व दैत्यकन्या के पति देवनारायण ने अपने जीवन में सिद्धियां प्राप्त कीं और अपनी दैवीय शक्तियों से पीड़ित मानवता के कष्टों को दूर किया। श्रीकृष्ण की भांति देवनारायण भी महान गौरक्षक थे, जिनके पास 98,000 पशुधन था और जिनकी सेना का मुख्य आधार 1,444 ग्वाले थे। जब राणा भिणाय ने उनकी गायों को घेरने का दुस्साहस किया, तब उन्होंने अपनी वीरता से गायों को मुक्त कराया और समाज को गौ-संरक्षण का संदेश दिया। उनके शौर्य और चमत्कारों की गाथा आज भी 'देवनारायण की फड़' के माध्यम से जीवित है, जो राजस्थान की सबसे लंबी और लोकप्रिय फड़ मानी जाती है जिसमें लगभग 15,000 पंक्तियां संग्रहित हैं। अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में ब्यावर के देहमाली में प्रवास करते हुए उन्होंने भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को बैकुंठ प्रस्थान किया, जिससे पूर्व उन्होंने अपने पुत्र बिला और पुत्री बिली को जन्म देकर परंपरा को आगे बढ़ाया। आज आसींद और जोधपुरीया जैसे स्थानों पर उनके भव्य मंदिर श्रद्धा के केंद्र हैं, जहाँ भक्त उन्हें 'लीला घोड़े के सवार' और 'कष्टों के निवारक' के रूप में भजते हैं। सत्य की रक्षा, आतंकवाद का विनाश और असहायों की सहायता करने वाले इस महानायक का प्रभाव इतना गहरा है कि राजस्थान सरकार ने उनकी जयंती पर सार्वजनिक अवकाश घोषित कर उनकी ऐतिहासिक महत्ता को स्वीकार किया है, जो आने वाली पीढ़ियों को उनके गौरवशाली आदर्शों की याद दिलाता रहेगा।

