कौन थे लाला जयदयाल और मेहराब खान? 1857 की क्रांति के वे महानायक जिन्होंने कोटा में हिला दी थी ब्रिटिश हुकूमत की नींव
कोटा रियासत में रेजिडेंसी पर कब्जे और मेजर बर्टन की हत्या के साथ शुरू हुए सशस्त्र विद्रोह में क्रांतिकारियों के संघर्ष और बलिदान की गाथा।

सन् 1857 की क्रांति की ज्वाला जब पूरे देश में धधक रही थी, तब कोटा राज्य में इस विद्रोह का नेतृत्व लाला जयदयाल और मेहराब खान जैसे प्रखर देशभक्तों ने किया, जिनके साहस ने इतिहास के पन्नों पर अमिट छाप छोड़ी। लाला जयदयाल, जो पेशे से एक वकील थे, अपनी प्रखर बुद्धि और रणनीतिक कौशल के लिए जाने जाते थे, वहीं मेहराब खान सेना में एक रिसालदार के पद पर तैनात थे और युद्ध कला में निपुण थे। इन दोनों नायकों ने मिलकर कोटा की जनता और सेना के भीतर छिपे असंतोष को एक संगठित विद्रोह का रूप दिया, जिसका मुख्य उद्देश्य दमनकारी ब्रिटिश रेजिडेंसी को उखाड़ फेंकना था। 15 अक्टूबर 1857 का वह ऐतिहासिक दिन था जब इन दोनों क्रांतिकारियों के आह्वान पर कोटा में क्रांति का बिगुल बजा और विद्रोही सेना ने भारी पराक्रम दिखाते हुए रेजिडेंसी को चारों तरफ से घेर लिया। इस भीषण संघर्ष के दौरान क्रांतिकारियों ने न केवल अंग्रेजी सेना को कड़ी चुनौती दी, बल्कि तत्कालीन पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन को मौत के घाट उतार दिया और रेजिडेंसी पर अपना अधिकार जमा लिया। यह जीत केवल एक सैन्य सफलता नहीं थी, बल्कि विदेशी हुकूमत के खिलाफ भारतीय अस्मिता और स्वाधीनता की सामूहिक पुकार थी, जिसने महीनों तक कोटा को अंग्रेजों के नियंत्रण से मुक्त रखा। जयदयाल और मेहराब खान ने इस दौरान न केवल युद्ध का संचालन किया, बल्कि प्रशासनिक सूझबूझ का परिचय देते हुए जनता के बीच एकता का संचार किया। संघर्ष के अंतिम दौर में जब ब्रिटिश सेना ने भारी लाव-लश्कर के साथ वापस घेराबंदी की, तब भी इन दोनों वीरों ने समर्पण करने के बजाय अंतिम सांस तक अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखा। अंततः इन महान क्रांतिकारियों को बंदी बनाकर फांसी दे दी गई, लेकिन उनका यह सर्वोच्च बलिदान व्यर्थ नहीं गया। लाला जयदयाल और मेहराब खान का जीवन और उनका संघर्ष आज भी हमें यह याद दिलाता है कि जब बुद्धि और बल का संगम राष्ट्रभक्ति के लिए होता है, तो वह सबसे बड़ी साम्राज्यवादी ताकतों को भी घुटने टेकने पर मजबूर कर सकता है। कोटा के ये दोनों सपूत भारतीय स्वाधीनता इतिहास के वे चिरस्थायी स्तंभ हैं, जिनकी वीरता की गूंज आज भी राजस्थान की हवाओं में महसूस की जा सकती है।

