कौन थे कुशल सिंह राठौर? 1857 की क्रांति के वो महानायक जिन्होंने चटका दी थी अंग्रेजों की अकड़।
ठाकुर कुशल सिंह ने बिथोड़ा और चेलावास के युद्ध में ब्रिटिश सेना को हराकर कैप्टन मोंक मेसन का वध किया था, जो राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम की अहम कड़ी है।

1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में राजस्थान की वीर प्रसूता भूमि के एक ऐसे नायक का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है, जिन्होंने अपनी वीरता और रणनीतिक कौशल से ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी। जोधपुर राज्य के औवा ठिकाने के ठाकुर कुशल सिंह राठौर, जिन्हें कुशल सिंह चंपावत के नाम से भी ख्याति प्राप्त है, मारवाड़ के एक स्वाभिमानी और शक्तिशाली सेनानायक थे। उनके विद्रोह की गाथा तब शुरू हुई जब उन्होंने माउंट आबू से दिल्ली की ओर कूच कर रहे जोधपुर क्षेत्र के विद्रोही सैनिकों को औवा में आमंत्रित किया। कुशल सिंह के इस साहसी आह्वान ने आसोप, बाजावा, गुलार और अलानियावास जैसे विभिन्न ठिकानों के ठाकुरों को एक सूत्र में पिरो दिया, जिससे एक संयुक्त सैन्य शक्ति का उदय हुआ। इस सैन्य एकजुटता की खबर जब राजपूताना के गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि जनरल लॉरेंस तक पहुँची, तो उन्होंने बौखलाहट में जोधपुर के महाराजा को अपनी राजकीय सेना के साथ औवा पर आक्रमण करने का आदेश दिया। जनरल लॉरेंस के दबाव में लेफ्टिनेंट हीथकोट के नेतृत्व में राजकीय सेना आगे तो बढ़ी, लेकिन बिथोड़ा के मैदान में कुशल सिंह के नेतृत्व वाली विद्रोही सेना ने ऐसा पराक्रम दिखाया कि ब्रिटिश समर्थित राजकीय सेना को मैदान छोड़कर भागना पड़ा।
बिथोड़ा की इस शानदार जीत ने जहाँ क्रांतिकारियों के हौसले बुलंद किए, वहीं इस अपमानजनक हार से तिलमिलाए जनरल लॉरेंस स्वयं नसीराबाद से एक विशाल सेना लेकर कुशल सिंह को धूल चटाने के लिए निकले। उनके साथ जोधपुर के पॉलिटिकल एजेंट कैप्टन मोंक मेसन भी अपनी सेना के साथ आ मिले। दोनों की संयुक्त सेना ने औवा के अभेद्य किले को घेर लिया, जिसके प्रत्युत्तर में कुशल सिंह और उनके योद्धा किले से बाहर निकलकर चेलावास के मैदान में शत्रुओं पर टूट पड़े। इस भीषण युद्ध में क्रांतिकारियों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए कैप्टन मोंक मेसन को मौत के घाट उतार दिया और उनके सिर को औवा किले के मुख्य द्वार पर लटका दिया, जो ब्रिटिश सत्ता के लिए सबसे बड़ी चुनौती और अपमान का प्रतीक बन गया। इस पराजय से भयभीत होकर जनरल लॉरेंस को वापस नसीराबाद पीछे हटना पड़ा। हालांकि, अक्टूबर 1857 में जब विद्रोही सैनिकों का एक बड़ा जत्था दिल्ली की ओर रवाना हुआ, तो औवा की शक्ति कुछ कम होने लगी। इसका लाभ उठाते हुए गवर्नर-जनरल ने ब्रिगेडियर होम्स के नेतृत्व में 30,000 सैनिकों की एक विशाल फौज भेजी। पाँच दिनों की कड़ी घेराबंदी के बाद अंततः औवा पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया और किला ध्वस्त कर दिया गया। कुशल सिंह वहां से सुरक्षित निकलने में सफल रहे और कोठारिया में शरण ली, जहाँ मेवाड़ के महाराणा ने उन्हें आश्रय प्रदान किया।
अपने जीवन के अंतिम वर्षों में संघर्षरत रहते हुए ठाकुर कुशल सिंह ने 8 अगस्त 1860 को नीमच छावनी में अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया और वर्ष 1864 में इस महान विभूति का निधन हो गया। ठाकुर कुशल सिंह राठौर का बलिदान और उनकी वीरता आज भी राजस्थान की लोक चेतना में जीवित है। उनकी स्मृतियों को संजोने के लिए वर्ष 2018 में औवा में एक भव्य पैनोरमा सह संग्रहालय का उद्घाटन किया गया, जहाँ उनकी प्रतिमा के साथ-साथ क्रांतिकारियों की आराध्य देवी सुगली माता का मंदिर भी स्थापित है। कुशल सिंह चंपावत मात्र एक ठिकानेदार नहीं थे, बल्कि वे उस अजेय राजपूती गौरव के प्रतीक थे जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए विदेशी दासता के विरुद्ध अपनी तलवार उठाकर इतिहास की धारा बदल दी थी। उनका व्यक्तित्व आज भी आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रप्रेम और स्वाभिमान की प्रेरणा देता है।

