कौन थे कुशल कोंवर? मातृभूमि की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमने वाले असम के महान सपूत
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ब्रिटिश हुकूमत ने कुशल कोंवर को रेल दुर्घटना के झूठे आरोप में 15 जून 1943 को फांसी दे दी थी।

असम की वीर प्रसूता भूमि ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अनेक नायकों को जन्म दिया, जिनमें शहीद कुशल कोंवर का नाम एक ऐसे तेजस्वी नक्षत्र के रूप में चमकता है जिसने अहिंसा के संकल्प और राष्ट्रभक्ति के अटूट विश्वास के साथ फांसी के फंदे को स्वीकार किया। वर्ष 1905 में असम के गोलाघाट जिले में जन्मे कुशल कोंवर का शुरुआती जीवन सादगी और उच्च आदर्शों से ओत-प्रोत था। वे महात्मा गांधी के विचारों से गहरे प्रभावित थे और उन्होंने अपने जीवन में सत्य, शाकाहार और धार्मिक शुद्धता को आत्मसात कर लिया था। जब 1942 में गांधीजी ने 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का नारा बुलंद किया, तब कुशल कोंवर ने इस आंदोलन की मशाल को असम के जन-जन तक पहुँचाने का बीड़ा उठाया। इस आंदोलन के दौरान 10 अक्टूबर 1942 को गोलाघाट के पास सूपथई में एक रेल दुर्घटना हुई, जिसमें कई ब्रिटिश सैनिक मारे गए। ब्रिटिश हुकूमत ने प्रतिशोध की भावना से ग्रसित होकर निर्दोष कुशल कोंवर को इस घटना का मुख्य षड्यंत्रकारी करार दिया, जबकि वे पूर्णतः अहिंसक और उस समय वहां अनुपस्थित थे। उन पर मुकदमा चलाया गया और झूठे साक्ष्यों के आधार पर उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। कारावास के दौरान भी उनकी आत्मिक शांति और ईश्वर के प्रति विश्वास अडिग रहा; उन्होंने जेल में श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करते हुए अपना समय व्यतीत किया। 15 जून 1943 की सुबह, जब उन्हें जोरहाट जेल में फांसी के तख्ते की ओर ले जाया गया, तो उनके चेहरे पर भय की जगह एक दैवीय शांति थी। उन्होंने हंसते-हंसते फंदे को चूमा और भारत माता की जय के उद्घोष के साथ अमर हो गए। कुशल कोंवर का यह बलिदान न केवल असम के लिए बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए वीरता की एक ऐसी मिसाल है, जो यह बताती है कि अन्याय के विरुद्ध मौन रहकर भी कितनी प्रखरता से लड़ा जा सकता है। उनकी शहादत आज भी हमें राष्ट्र के प्रति निस्वार्थ सेवा और नैतिक मूल्यों पर अडिग रहने की प्रेरणा देती है।

