कौन थे कुंवर सिंह? 80 वर्ष की आयु में अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाले भारतीय स्वाधीनता के वह 'भीष्म पितामह'
जगदीशपुर के जमींदार बाबू कुंवर सिंह ने 80 वर्ष की आयु में अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा संभाला और आरा को स्वतंत्र कराकर भारतीय इतिहास में अद्वितीय मिसाल पेश की।

13 नवंबर 1777 को बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर गांव में एक प्रतिष्ठित क्षत्रिय जमींदार परिवार में जन्मे कुंवर सिंह का व्यक्तित्व बचपन से ही ओजस्वी था। उनके पिता बाबू साहबजादा सिंह और माता पंचरत्न कुंवर ने उन्हें वीरता के संस्कारों से सींचा था, हालांकि उनके पिता के ब्रिटिश सरकार के साथ संबंध काफी गहरे थे, परंतु कुंवर सिंह के भीतर राष्ट्रभक्ति की ज्वाला सदा प्रज्वलित रही। जगदीशपुर की माटी में पले-बढ़े कुंवर सिंह के भाइयों—अमर सिंह, दयालु सिंह और राजपति सिंह ने भी स्वतंत्रता की इस चेतना को अक्षुण्ण बनाए रखने में उनका भरपूर सहयोग दिया। वर्ष 1857 का समय भारतीय इतिहास का वह निर्णायक मोड़ था जब हिंदू और मुस्लिम समुदाय ने संगठित होकर ब्रिटिश हुकूमत को जड़ से उखाड़ने का संकल्प लिया। मंगल पांडे के बलिदान ने जिस क्रांति की मशाल जलाई थी, उसकी लौ दानापुर रेजिमेंट, बैरकपुर और रामगढ़ से होते हुए मेरठ, कानपुर, लखनऊ और झांसी तक फैल गई। इस संक्रमण काल में जब देश को एक अनुभवी नेतृत्व की आवश्यकता थी, तब अस्सी वर्ष की आयु में भी अदम्य ऊर्जा से लबरेज बाबू कुंवर सिंह ने अपने सेनापति मैकू सिंह और भारतीय सैनिकों की कमान संभाली। 27 अप्रैल 1857 को उन्होंने दानापुर और भोजपुर के जांबाज सिपाहियों के साथ मिलकर आरा शहर पर अधिकार कर लिया, जो उनकी सैन्य कुशलता का प्रत्यक्ष प्रमाण था।
ब्रिटिश सेना ने इस प्रतिरोध को कुचलने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, जिसके फलस्वरूप बीबीगंज और बिहिया के सघन जंगलों में भीषण रक्तपात हुआ। अंग्रेजों के भारी दबाव के कारण जब उन्हें अपनी मातृभूमि जगदीशपुर को अस्थायी रूप से छोड़ना पड़ा, तब भी उनके हौसले पस्त नहीं हुए। उन्होंने रीवा, बांदा, आजमगढ़, बनारस, बलिया और गाजीपुर जैसे क्षेत्रों में विद्रोह का शंखनाद किया और छापामार युद्ध नीति के माध्यम से अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया। उनकी वीरता का लोहा मानते हुए प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासकार होम्स ने भी लिखा था कि उस वृद्ध राजपूत ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जिस गौरव और वीरता के साथ युद्ध किया, वह अविश्वसनीय था; यदि वे युवा होते तो अंग्रेजों को 1857 में ही भारत छोड़ना पड़ता। अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर 23 अप्रैल 1858 को उन्होंने जगदीशपुर के पास ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना को निर्णायक रूप से पराजित किया। युद्ध के दौरान वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे, परंतु इस महान योद्धा ने तब तक हार नहीं मानी जब तक कि जगदीशपुर के किले से यूनियन जैक को उतारकर अपना विजय पताका नहीं फहरा दिया। अंततः 26 अप्रैल 1858 को अपनी मातृभूमि को स्वतंत्र कराने के पश्चात इस महान सेनानी ने अपनी अंतिम सांस ली। बाबू कुंवर सिंह का जीवन हमें सिखाता है कि वीरता और संकल्प के लिए आयु मात्र एक संख्या है, और उनका यह बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की अमर गाथा के रूप में सदैव आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।

