कौन थे हर्षवर्धन? प्राचीन भारत के वह प्रतापी सम्राट जिन्होंने अपनी वीरता और विद्वत्ता से युग परिवर्तन किया।
सम्राट हर्षवर्धन ने उत्तर भारत को एकीकृत कर कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया और कला, साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया।

प्राचीन भारत के इतिहास में सम्राट हर्षवर्धन एक ऐसे प्रकाशपुंज के रूप में उभरते हैं, जिन्होंने गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद फैली अराजकता के अंधकार को अपनी प्रशासनिक कुशलता और अदम्य साहस से समाप्त किया। ५९० ईस्वी में थानेसर की पवित्र भूमि पर प्रभाकरवर्धन के घर जन्मे हर्ष का जीवन केवल विजयों की गाथा नहीं, बल्कि त्याग, कूटनीति और सांस्कृतिक पुनरुत्थान का एक जीवंत दस्तावेज है। वर्धन वंश के इस प्रतापी राजकुमार का सिंहासन तक पहुँचने का मार्ग काँटों भरा था; पिता के निधन के पश्चात उनके बड़े भाई राज्यवर्धन राजा बने, किंतु मालवा के राजा देवगुप्त और गौड़ नरेश शशांक के षड्यंत्र ने उनके भाई के जीवन का अंत कर दिया। मात्र १६ वर्ष की अल्पायु में ६०६ ईस्वी में जब हर्ष ने सत्ता संभाली, तो उनके सामने बिखरा हुआ साम्राज्य और अपनी बहन राज्यश्री को बचाने की कठिन चुनौती थी। उन्होंने न केवल विंध्य के जंगलों से अपनी बहन को सती होने से बचाया, बल्कि थानेसर और कन्नौज के राज्यों को एकीकृत कर एक विशाल साम्राज्य की नींव रखी।
हर्षवर्धन का शासनकाल उत्तर भारत की राजनीतिक स्थिरता का स्वर्ण युग माना जाता है, जिसकी राजधानी कन्नौज वैभव और संस्कृति का केंद्र बनी। उनके साम्राज्य का विस्तार पूर्व में कामरूप से लेकर पश्चिम में वल्लभी तक और उत्तर में कश्मीर की सीमाओं से दक्षिण में नर्मदा नदी के तट तक फैला हुआ था। यद्यपि दक्षिण विस्तार के दौरान नर्मदा के युद्ध में उन्हें चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय से पराजय का सामना करना पड़ा, किंतु उत्तर भारत में उनका आधिपत्य निर्विवाद रहा। हर्ष एक उदार शासक थे जिन्होंने हिंदू परिवार में जन्म लेने के बावजूद बौद्ध धर्म के महायान पंथ को संरक्षण दिया और सर्वधर्म समभाव की नीति अपनाई। वे अपनी दानशीलता के लिए विश्व विख्यात थे; प्रत्येक पाँच वर्ष में प्रयाग के संगम तट पर आयोजित होने वाले महामोक्ष परिषद में वे अपना सर्वस्व दान कर देते थे, यहाँ तक कि अपने शरीर के वस्त्र भी। इसी कालखंड में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) उनके दरबार में आठ वर्षों तक रहे, जिन्होंने हर्ष के प्रशासन, न्याय व्यवस्था और उनकी परोपकारी प्रकृति का विस्तृत वर्णन अपनी स्मृतियों में किया है।
एक कुशल सेनापति और कूटनीतिज्ञ होने के साथ-साथ हर्ष स्वयं एक उच्च कोटि के विद्वान और वीणा वादक थे। संस्कृत साहित्य के इतिहास में उनके द्वारा रचित 'नागनंद', 'रत्नावली' और 'प्रियदर्शिका' जैसे नाटक आज भी अनमोल धरोहर माने जाते हैं। उनके दरबार में बाणभट्ट जैसे महान साहित्यकार सुशोभित थे, जिन्होंने 'हर्षचरित' लिखकर सम्राट के जीवन को अमर कर दिया। हर्ष का प्रशासन इतना दूरदर्शी था कि उन्होंने सती प्रथा जैसी कुरीतियों पर प्रतिबंध लगाया और शिक्षा के प्रसार हेतु नालंदा विश्वविद्यालय को अभूतपूर्व दान दिया, जिससे वह विश्व का अग्रणी शिक्षण केंद्र बना। आर्थिक दृष्टि से भी उनका कालखंड समृद्धि का शिखर था, जहाँ कृषि और व्यापार ने नए आयाम छुए। ६४७ ईस्वी में सम्राट हर्ष के निधन के साथ ही प्राचीन भारत का एक महान अध्याय समाप्त हो गया, क्योंकि उनका कोई उत्तराधिकारी जीवित नहीं था, जिससे उनका विशाल साम्राज्य धीरे-धीरे बिखर गया।
सम्राट हर्षवर्धन का व्यक्तित्व एक ऐसे युगपुरुष का था जिसने राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंड भारत के स्वप्न को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर रखा। उनके द्वारा शुरू किया गया कुंभ मेला और शिक्षा व कला के प्रति उनका समर्पण आज भी भारतीय संस्कृति की नींव में रचे-बसे हैं। वे भारत के अंतिम महान हिंदू सम्राट थे जिन्होंने तलवार और कलम, दोनों की शक्ति से आर्यावर्त को गौरवान्वित किया, और उनका गौरवशाली इतिहास आज भी आने वाली पीढ़ियों को न्यायप्रियता और वीरता की प्रेरणा देता रहेगा।

