भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में खुदीराम बोस का नाम एक ऐसे प्रज्वलित नक्षत्र के समान है, जिसकी चमक ने ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को हिलाकर रख दिया था। 3 दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के बहुवैनी गाँव में बाबू त्रैलोक्यनाथ बोस और लक्ष्मीप्रिया देवी के घर जन्मे खुदीराम के भीतर राष्ट्रभक्ति का ज्वार बचपन से ही उमड़ रहा था। एक कायस्थ परिवार में पले-बढ़े इस बालक की आँखों में देश की आज़ादी का सपना इतना प्रबल था कि उन्होंने नौवीं कक्षा के बाद अपनी पढ़ाई छोड़ दी और पूर्णतः स्वदेशी आंदोलन में कूद पड़े। छात्र जीवन से ही उनके हृदय में अत्याचारी ब्रिटिश हुकूमत को जड़ से उखाड़ने का संकल्प दृढ़ हो चुका था। किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रखते ही वे ‘युगांतर’ जैसी गुप्त क्रांतिकारी संस्था से जुड़ गए और ‘वंदे मातरम्’ के पर्चे बांटने से लेकर बंग-भंग विरोधी आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाने लगे। उनकी निर्भीकता का पहला बड़ा उदाहरण 1906 के मिदनापुर औद्योगिक मेले में देखने को मिला, जहाँ राजद्रोही पर्चे बांटने के दौरान उन्होंने एक पुलिसकर्मी को साहसपूर्वक चुनौती दी और वहाँ से भाग निकलने में सफल रहे। हालांकि उन पर राजद्रोह का मुकदमा चला, लेकिन साक्ष्यों के अभाव में वे बरी हो गए, जिसने उनके हौसलों को और अधिक ऊँचा कर दिया।

क्रांति की इस राह पर चलते हुए खुदीराम बोस का सामना तत्कालीन कलकत्ता के क्रूर मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड से हुआ, जो क्रांतिकारियों को अमानवीय दंड देने के लिए कुख्यात था। जब किंग्सफोर्ड को मुजफ्फरपुर स्थानांतरित किया गया, तो क्रांतिकारी दल ने उसकी हत्या का जिम्मा खुदीराम बोस और प्रफुल्ल कुमार चाकी को सौंपा। 30 अप्रैल 1908 की रात भारतीय क्रांतिकारी इतिहास की एक युगांतरकारी घटना बनी, जब मुजफ्फरपुर में किंग्सफोर्ड के बंगले के बाहर इन दोनों वीरों ने उसकी बग्गी समझकर एक वाहन पर शक्तिशाली बम फेंका। उस धमाके की गूँज न केवल तीन मील दूर तक सुनाई दी, बल्कि उसने सात समंदर पार ब्रिटेन की संसद को भी दहला दिया। दुर्भाग्यवश, उस बग्गी में किंग्सफोर्ड की जगह दो यूरोपीय महिलाएँ सवार थीं, जिनकी इस हमले में मृत्यु हो गई। घटना के बाद खुदीराम नंगे पाँव मिलों का सफर तय कर वैनी रेलवे स्टेशन पहुँचे, जहाँ संदेह के आधार पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि उनके साथी प्रफुल्ल चाकी ने पकड़े जाने से पहले स्वयं को गोली मारकर शहादत दे दी।

महज 18 वर्ष की आयु में जब खुदीराम बोस को मृत्युदंड सुनाया गया, तो उनके चेहरे पर भय की एक लकीर तक न थी। मुजफ्फरपुर जेल के मजिस्ट्रेट ने स्वयं स्वीकार किया था कि यह किशोर किसी शेर के बच्चे की तरह निर्भीक होकर फांसी के फंदे की ओर बढ़ा था। 11 अगस्त 1908 को हाथ में श्रीमद्भागवत गीता थामे, चेहरे पर मुस्कान लिए खुदीराम बोस भारत माता की आज़ादी के लिए बलिदान हो गए। उनकी शहादत ने पूरे देश में राष्ट्रवाद की एक ऐसी लहर पैदा की कि बंगाल के बुनकर उनकी याद में 'खुदीराम' नाम लिखी किनारी वाली धोतियां बुनने लगे, जो उस दौर के युवाओं के लिए देशभक्ति का प्रतीक बन गईं। आज भी लोकगीतों और इतिहास के पन्नों में खुदीराम बोस का बलिदान एक ऐसी प्रेरणा के रूप में जीवित है, जो हमें सिखाता है कि मातृभूमि की रक्षा के लिए आयु का नहीं, बल्कि अडिग संकल्प का होना आवश्यक है।

Pratahkal HQ

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