कौन थे खान अब्दुल गफ्फार खान? भारतीय स्वाधीनता संग्राम के वह 'सरहदी गांधी' जिन्होंने अहिंसा को बनाया पठानों की शक्ति
खुदाई खिदमतगार के संस्थापक और अहिंसा के पुजारी बादशाह खान के जीवन संघर्ष, देश विभाजन के विरोध और ऐतिहासिक योगदान का विस्तृत विवरण।

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में एक ऐसा व्यक्तित्व भी हुआ, जिसने कट्टरता और हिंसा के पर्याय माने जाने वाले उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में अहिंसा की अलख जगाकर ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिला दीं। खान अब्दुल गफ्फार खान, जिन्हें दुनिया 'बच्चा खान', 'बादशाह खान' और 'सरहदी गांधी' के नाम से जानती है, एक ऐसे महानायक थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन मानवता, सांप्रदायिक सौहार्द और स्वाधीनता के लिए समर्पित कर दिया। साल 1890 में पेशावर के एक संपन्न परिवार में जन्मे अब्दुल गफ्फार खान को देशप्रेम और जुझारूपन विरासत में मिला था। उनके परदादा अब्दुल्ला खान ने पठानी कबीलों और भारतीय स्वतंत्रता के लिए प्राणों की आहुति दी थी, तो वहीं उनके दादा सैफुल्लाह खान ने भी जीवनपर्यंत अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष जारी रखा। अपने पूर्वजों के इसी साहस को आत्मसात करते हुए बादशाह खान ने शिक्षा प्राप्त करने के बाद स्वयं को राष्ट्र सेवा में झोंक दिया। हालांकि उनके पिता बहराम खान एक शांत और ईश्वरभक्त व्यक्ति थे, जिन्होंने विरोध के बावजूद उन्हें मिशनरी स्कूल में पढ़ाया, लेकिन गफ्फार खान का गंतव्य अलीगढ़ के कॉलेज से कहीं आगे अपने गांव की गलियों और वहां के लोगों की सेवा में था।
पेशावर में 1919 में मार्शल लॉ के दौरान शांति की अपील करने के बावजूद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, जो उनके राजनीतिक जीवन का एक बड़ा मोड़ साबित हुआ। अंग्रेजों ने उन पर झूठे आरोप लगाकर गवाह जुटाने की कोशिश की, लेकिन किसी भी देशप्रेमी ने उनके खिलाफ गवाही नहीं दी। इसी संघर्ष के बीच 1930 में उन्होंने 'खुदाई खिदमतगार' संगठन की नींव रखी, जिसे 'सुर्ख पोश' या लाल कुर्ती दल भी कहा जाता था। इस संगठन के माध्यम से उन्होंने पठानों को यह सिखाया कि अहिंसा केवल कमज़ोरों का अस्त्र नहीं, बल्कि वीरों का आभूषण है। उनके इस संगठन का ध्येय एक संयुक्त, स्वतंत्र और धर्मनिरपेक्ष भारत का निर्माण करना था। जेल की सलाखों के पीछे भी उनका व्यक्तित्व निखरता रहा; उन्होंने गुजरात जेल में रहते हुए न केवल गीता और सिख गुरुओं के ग्रंथों का अध्ययन किया, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए जेल के भीतर ही कुरान और गीता की कक्षाएं शुरू करवाईं।
गांधी-इरविन समझौते के बाद उनकी रिहाई हुई, लेकिन संघर्ष का सिलसिला थमा नहीं। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें पुनः बंदी बनाया गया और वे 1947 में ही मुक्त हो सके। देश का विभाजन बादशाह खान के लिए किसी गहरे जख्म से कम नहीं था; वे अंत तक अखंड भारत के समर्थक रहे और विभाजन के समय उन्होंने दुखी होकर कहा था कि भारत ने उन्हें 'भेड़ियों के आगे फेंक दिया है'। विभाजन के बाद पाकिस्तान में रहते हुए भी उन्होंने पश्तूनों के अधिकारों और स्वतंत्र पश्तूनिस्तन के लिए अपनी आवाज बुलंद रखी, जिसके कारण उन्हें अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तानी जेलों और निर्वासन में बिताना पड़ा। साल 1987 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से नवाजा, जो उनकी अद्वितीय सेवाओं का प्रमाण था। 20 जनवरी 1988 को पेशावर में नजरबंदी के दौरान इस महान आत्मा ने अंतिम सांस ली और उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार उन्हें अफगानिस्तान के जलालाबाद में सुपुर्द-ए-खाक किया गया, जो सीमाओं के पार उनकी स्वीकार्यता को दर्शाता है। आज भी बादशाह खान का जीवन हमें सिखाता है कि सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर सबसे कठिन लड़ाइयां भी जीती जा सकती हैं।

