राजस्थान की रेतीली धरती न केवल शूरवीरों की वीरता के लिए जानी जाती है, बल्कि यह उन आध्यात्मिक शक्तियों की भी साक्षी रही है जिन्होंने समय-समय पर अधर्म का नाश कर लोक-कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। इन्हीं शक्तियों में सर्वोच्च स्थान रखती हैं भगवती करणी जी महाराज, जिन्हें जगदम्बा, मेहाई और किनियाणी जैसे श्रद्धापूर्ण नामों से पुकारा जाता है। 14वीं से 16वीं शताब्दी के मध्य पश्चिमी राजस्थान की धरा पर एक योद्धा संत के रूप में अवतरित हुई करणी माता केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि मारवाड़ और बीकानेर के साम्राज्यों की आधारशिला रखने वाली वह दिव्य चेतना थीं, जिनके आशीर्वाद के बिना इन किलों की दीवारें खड़ी होना असंभव माना जाता था। हिंगलाज माता के अवतार के रूप में पूजनीय करणी माता का जीवन त्याग, तपस्या और जनसेवा का एक ऐसा अनूठा संगम है, जिसने न केवल तत्कालीन राजनीतिक अस्थिरता को समाप्त किया, बल्कि समाज में अहिंसा और सह-अस्तित्व के मानवीय मूल्यों को भी स्थापित किया।

विक्रम संवत 1444 की आसोज शुक्ल सप्तमी को जोधपुर के सुवाप गाँव में मेहाजी किनिया और देवल बाई के घर जन्मी इस दिव्य बालिका का नाम प्रारंभ में रिद्धि कंवर रखा गया था। कहा जाता है कि उनके जन्म से पूर्व ही हिंगलाज माता ने उनकी माता को दर्शन देकर स्वयं के आगमन की सूचना दी थी। रिद्धि कंवर के अवतार होने का पहला प्रमाण उनके जन्म के सातवें दिन ही मिल गया था, जब उनकी बुआ ने उन्हें चोट पहुँचाने का प्रयास किया और उनकी उंगलियाँ तत्काल जड़ हो गईं। इस चमत्कार के बाद मेहाजी ने उन्हें 'करणी' नाम दिया, जिसका अर्थ है 'करने वाली' या 'शक्ति स्वरूपा'। उनका प्रारंभिक जीवन चमत्कारों और लोक-हितकारी कार्यों से भरा रहा, जिसमें प्यासे गाँवों में जल की व्यवस्था करना और असहायों की सहायता करना शामिल था। समय के साथ उनकी ख्याति चारों दिशाओं में फैल गई और पुगल के राव शेखा जैसे शक्तिशाली शासक भी उनके चरणों में नतमस्तक होने लगे। माता ने राव शेखा को न केवल युद्धों में विजयी बनाया, बल्कि उनके हठी स्वभाव को बदलकर उन्हें धर्म के मार्ग पर अग्रसर किया।

करणी माता का विवाह संवत 1473 में साठिका गाँव के देपाजी रोहाड़िया के साथ हुआ, लेकिन उनका जीवन सांसारिक सुखों के लिए नहीं बल्कि उच्च आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए था। उन्होंने अपने पति को सत्य से अवगत कराया कि उनका शरीर भौतिक इच्छाओं के अधीन नहीं है, और लोक-परंपरा की निरंतरता के लिए अपनी बहन गुलाब बाई का विवाह देपाजी से करवा दिया। इसके पश्चात उन्होंने साठिका छोड़कर जांगलू की ओर प्रस्थान किया, जहाँ उस समय की राजनीतिक स्थिति अत्यंत भयावह थी। दिल्ली के सुल्तानों और स्थानीय सरदारों के बीच निरंतर युद्धों से जनता त्रस्त थी। माता करणी ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए बिखरी हुई हिंदू शक्तियों को एकजुट करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने राव रणमल को उनके अधिकार दिलाने और उनके वंशजों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए महत्वपूर्ण भविष्यवाणियां कीं। जब अत्याचारी राव कान्हा ने उनकी गायों और भक्तों को प्रताड़ित करने का प्रयास किया, तब माता ने अपनी शक्ति से उसका अंत कर जांगलू में शांति स्थापित की और रणमल को वहाँ का शासक घोषित किया।

करणी माता के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय जोधपुर और बीकानेर के किलों की नींव रखना रहा है। संवत 1515 में राव जोधा के विनम्र अनुरोध पर उन्होंने मेहरानगढ़ किले की नींव अपने कर-कमलों से रखी, जिसके बाद जोधपुर एक अजेय साम्राज्य के रूप में उभरा। इसी प्रकार, राव बीका को नया राज्य स्थापित करने की प्रेरणा देकर उन्होंने संवत 1542 में बीकानेर के किले की नींव रखी। वे एक ऐसी मार्गदर्शक थीं जिन्होंने राजाओं को शासन करने की शक्ति तो दी, लेकिन साथ ही उन्हें नैतिकता और न्याय का पाठ भी पढ़ाया। देशनोक की स्थापना कर उन्होंने उस बंजर भूमि को एक पवित्र अभयारण्य में बदल दिया, जहाँ आज भी हजारों जीव सुरक्षित रहते हैं। उनके सबसे अद्भुत चमत्कारों में से एक उनके पुत्र लक्ष्मण को यमराज से वापस लाना था, जिसके बाद उन्होंने यह व्यवस्था दी कि उनके चारण भक्त मृत्यु के पश्चात देशनोक के मंदिर में 'काबा' (चूहे) के रूप में जन्म लेंगे और पुनः मानव योनी में लौटेंगे।

अपने 151 वर्षों के लंबे जीवनकाल में करणी माता ने केवल आध्यात्मिक शांति ही नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और अहिंसा का संदेश भी दिया। संवत 1595 के चैत्र शुक्ल नवमी को जैसलमेर और बीकानेर की सीमा पर धिनेरू तलाई के पास उन्होंने अपनी भौतिक देह को एक दिव्य ज्योति में विलीन कर दिया। उनकी विरासत आज देशनोक के भव्य मंदिर के रूप में जीवित है, जहाँ चूहों के प्रति श्रद्धा और प्रकृति के संरक्षण का अद्भुत उदाहरण देखने को मिलता है। राजस्थान की लोक संस्कृति, इतिहास और सैन्य शक्ति (विशेषकर मारवाड़ रेजिमेंट) में करणी माता का स्थान सदैव सर्वोच्च रहेगा। वे आज भी अपने भक्तों की रक्षक और अजेय शक्ति की प्रतीक बनकर मरुधरा के कण-कण में विद्यमान हैं।

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