कौन थे कन्हैयालाल सेठिया? राजस्थानी माटी की महक और देशभक्ति के अमर चितेरे
राजस्थानी साहित्य के 'भीष्म पितामह' और पद्म श्री से सम्मानित कन्हैयालाल सेठिया का जीवन परिचय, प्रमुख कृतियां और स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान।

राजस्थान की रेतीली माटी में जन्में महाकवि कन्हैयालाल सेठिया केवल एक साहित्यकार नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रीयता और राजस्थानी अस्मिता के एक जीवंत प्रतीक थे। 11 सितंबर, 1919 को चूरू जिले के सुजानगढ़ में छगनमलजी सेठिया और मनोहरी देवी के आंगन में जन्मा यह बालक आगे चलकर अपनी लेखनी से मरूधरा का 'भीष्म पितामह' कहलाया। सेठिया जी का जीवन दर्शन महात्मा गांधी के आदर्शों से ओतप्रोत था, जिसके प्रभावस्वरूप उन्होंने न केवल खादी को अपनाया, बल्कि दलित उद्धार और समाज सुधार के कार्यों में भी खुद को झोंक दिया। उनकी शिक्षा बी.ए. तक रही, लेकिन उनकी बौद्धिक गहराई और साहित्यिक दृष्टि किसी भी औपचारिक उपाधि से कहीं ऊपर थी। 1937 में धापू देवी के साथ परिणय सूत्र में बंधने के बाद उनका पारिवारिक जीवन सुचारू रहा, परंतु उनके भीतर की साहित्यिक अग्नि उन्हें निरंतर समाज और राष्ट्र के लिए कुछ विशेष करने को प्रेरित करती रही।
सेठिया जी का साहित्यिक सफर तब एक क्रांतिकारी मोड़ पर आया जब उन्होंने 'अग्निवीणा' जैसी ओजस्वी कृतियों के माध्यम से ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी। उनकी कविताओं में राष्ट्रभक्ति का ऐसा ज्वार था कि अंग्रेज सरकार ने उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाकर उन्हें जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया। बीकानेर प्रजामंडल के सक्रिय सदस्य के रूप में और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कराची की गलियों में जनसभाएं कर उन्होंने लोगों को गुलामी की जंजीरें तोड़ने के लिए जागृत किया। उनकी लेखनी में वह शक्ति थी जो सिकंदर और बाबर जैसी ऐतिहासिक शख्सियतों के साहस और संघर्ष का स्मरण कराकर सोई हुई भारतीय आत्मा को झकझोर देती थी। वे अक्सर अपनी पंक्तियों के माध्यम से चेतावनी देते थे कि भारत की तलवार सोई नहीं है और इस देश की मिट्टी की रक्षा के लिए वे अपना रक्त देने से कभी पीछे नहीं हटेंगे।
कन्हैयालाल सेठिया की कीर्ति का सबसे चमकता सितारा उनकी कालजयी रचना 'धरती धोरां री' बनी। इस एक गीत ने राजस्थान की संस्कृति, शौर्य और प्राकृतिक सौंदर्य को जिस आत्मीयता से पिरोया कि वह आज हर राजस्थानी की जुबान पर एक प्रार्थना की तरह बस गया है। उनकी अन्य प्रमुख कृतियों में 'पाथल और पीथल', 'मींझर', 'लीलतांस' और 'जमीन रो धणी कुण' शामिल हैं, जिन्होंने उन्हें राजस्थानी साहित्य का सर्वोच्च शिखर बना दिया। वे केवल राजस्थानी तक सीमित नहीं रहे; उन्होंने हिंदी और उर्दू में भी 'निर्ग्रंथ', 'स्वागत' और 'ताजमहल' जैसी उत्कृष्ट रचनाएं दीं। उनकी साहित्यिक महानता का प्रमाण उन्हें मिले अनगिनत सम्मान हैं, जिनमें 1988 में ज्ञानपीठ का 'मूर्तिदेवी साहित्य पुरस्कार', साहित्य अकादमी पुरस्कार और 2004 में भारत सरकार द्वारा प्रदत्त 'पद्म श्री' मुख्य हैं। इसके अतिरिक्त उन्हें 'साहित्य मनीषी' और 'राजस्थान रत्न' (मरणोपरांत) जैसे गौरवशाली अलंकरणों से भी नवाजा गया।
11 नवंबर, 2008 को भले ही यह महान विभूति पंचतत्व में विलीन हो गई, लेकिन उनकी विरासत आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में जीवित है। सेठिया जी ने अपनी कविताओं के माध्यम से यह संदेश दिया कि साहित्य केवल शब्दों का जाल नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति के हक की लड़ाई और अपनी मातृभूमि के प्रति अटूट प्रेम का दस्तावेज है। उन्होंने राजस्थान को उसकी सोई हुई वीरता और गौरव की याद दिलाई और यह सिद्ध किया कि एक कवि की कलम किसी भी शस्त्र से अधिक प्रभावशाली हो सकती है। आज जब भी राजस्थान की सुरीली धरती पर 'धरती धोरां री' की गूंज सुनाई देती है, महाकवि कन्हैयालाल सेठिया अपनी रचनाओं के माध्यम से अमर होकर हमारे सम्मुख मुस्कुराते प्रतीत होते हैं।

