क्या है कम्मा समुदाय? दक्षिण भारतीय इतिहास का एक पराक्रमी, समृद्ध और प्रभावशाली गौरवशाली अध्याय
आंध्र प्रदेश के उपजाऊ कम्मानाडु से निकले कम्मा समाज का विजयनगर साम्राज्य से लेकर आधुनिक राजनीति, टॉलीवुड और उद्योग जगत में रहा है गहरा प्रभाव।

भारतीय इतिहास की सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक संरचना में कुछ समुदायों ने न केवल अपनी अमिट छाप छोड़ी है, बल्कि समय की धारा को भी प्रभावित किया है। ऐसा ही एक विशिष्ट और प्रभावशाली समुदाय है 'कम्मा' (Kamma), जिसका उद्भव और विकास दक्षिण भारत, विशेषकर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के तेलुगुभाषी क्षेत्रों में हुआ। कम्मा समुदाय की ऐतिहासिक प्रासंगिकता आज भी उतनी ही जीवंत है जितनी सदियों पहले थी, क्योंकि समकालीन दौर में भी यह वर्ग आंध्र प्रदेश के सबसे समृद्ध, उद्यमी और सामाजिक-राजनीतिक रूप से वर्चस्वशाली समूहों में गिना जाता है। इस समुदाय का ऐतिहासिक सफरनामा केवल एक जाति के विकास की कहानी नहीं है, बल्कि यह दक्षिण भारत के कृषि विकास, सैन्य कौशल, राजवंशों के उत्थान-पतन और आधुनिक उद्योग जगत के निर्माण का एक प्रामाणिक दस्तावेज़ है।
कम्मा समुदाय के ऐतिहासिक उद्भव की जड़ें तटीय आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक 'कम्मानाडु' (Kammanadu) क्षेत्र से जुड़ी हैं, जो तत्कालीन गुंटूर और ओंगोल (प्रकाशम) जिलों के अंतर्गत गुंडलाकम्मा और कृष्णा नदी के बीच का एक अत्यंत उपजाऊ मैदानी भूभाग था। इस क्षेत्र की प्रशासनिक और सामाजिक पहचान प्रागैतिहासिक और प्राचीन काल से ही अक्षुण्ण रही है। सातवाहन काल के प्रशासनिक ढाँचे में यह क्षेत्र 'राष्ट्र' के रूप में संगठित था, जिसे बाद में इक्ष्वाकु, पल्लव और पूर्वी चालुक्य राजवंशों ने भी अपनाया। इक्ष्वाकु कालीन तीसरी शताब्दी के जग्गय्यापेटा अभिलेखों और चौथी शताब्दी के पल्लव नरेश शिवस्कन्दवर्मन के मयिदावोलु दानपत्र में इस क्षेत्र को संस्कृत में 'कर्म-राष्ट्र' कहा गया है। बाद में आनंद गोत्रिका वंश के राजा दामोदरवर्मन के मत्तेपाड अनुदान में इसे प्राकृत रूप 'कम्मक-रत्थ' कहा गया। सातवीं शताब्दी के पश्चात पूर्वी चालुक्यों और तेलुगु चोडों के शासनकाल में यह संस्कृत नाम स्थानीय तेलुगु भाषा के प्रभाव से 'कम्मानाडु' के रूप में परिवर्तित हो गया, जिसकी पुष्टि बारहवीं शताब्दी के कोनिदेना अभिलेखों से होती है। भाषाविदों और इतिहासकारों का मानना है कि 'कम्मा' शब्द की उत्पत्ति या तो क्षेत्र की दो सीमाओं को निर्धारित करने वाली नदियों से हुई है या फिर इस क्षेत्र में कभी अत्यंत प्रभावशाली रहे बौद्ध संघों के 'संघकम्मा' अनुष्ठानों से प्रेरित रही है।
मध्यकालीन भारत के इतिहास में, विशेषकर काकतीय राजवंश के पतन के बाद, कम्मा समुदाय ने एक विशुद्ध कृषक पृष्ठभूमि से निकलकर सैन्य और प्रशासनिक नेतृत्व के रूप में अपनी पहचान सुदृढ़ की। एक लोकप्रिय जनश्रुति के अनुसार कम्मा, वेलमा और रेड्डी समुदायों का उद्भव एक ही कापु (कृषक) मूल से हुआ था। विजयनगर साम्राज्य का कालखंड कम्मा समुदाय के गौरव का स्वर्ण युग माना जाता है। महाराजा कृष्णदेवराय के शासनकाल में कम्मा योद्धा विजयनगर सेना के मुख्य स्तंभ और रक्षक बनकर उभरे। इस दौर में कई प्रमुख कम्मा नायक कुलों जैसे पेम्मासानी, सायपनेनी और रावेल्ला ने साम्राज्य की रक्षा और विस्तार में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। पेम्मासानी नायक वंश ने रायलसीमा क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया और गंडिकोटा को अपना सुदृढ़ गढ़ बनाया। इस वंश के पेम्मासानी रामलिंग नायडू कृष्णदेवराय के प्रधान सेनापति थे, जिन्होंने कई ऐतिहासिक युद्ध जीते। इसी प्रकार रावेल्ला नायकों ने उदयगिरि और श्रीशैलम क्षेत्रों पर शासन किया और कुतुबशाही तथा गजपति राजाओं को परास्त किया। वर्ष 1565 में तालीकोटा के युद्ध के बाद जब विजयनगर साम्राज्य बिखरने लगा, तब इन कम्मा नायकों ने अराविदु राजवंश की सहायता की और मुस्लिम आधिपत्य को लंबे समय तक रोके रखा, जिसे अंततः 1652 में मीर जुमला ने गंडिकोटा पर अधिकार कर समाप्त किया।
विजयनगर साम्राज्य के पतन के पश्चात कम्मा सरदारों ने कुतुबशाही और बाद में हैदराबाद के निजाम के शासनकाल में भी अपनी महत्ता बनाए रखी। वे क्षेत्रीय अभिजात वर्ग, राजस्व अधिकारी (देशमुख) और जागीरदार के रूप में स्थापित हुए। इस कालखंड में कम्मा सरदारों को 'चौधरी' की उपाधि प्राप्त हुई, जो आज भी उनकी पहचान का एक अहम हिस्सा है। वासिरेड्डी क्लैन के वासिरेड्डी वेंकट Adri नायडू एक ऐसे ही महान कम्मा जमींदार थे, जिन्होंने गुंटूर और कृष्णा जिलों के सैकड़ों गांवों पर शासन किया और भव्य हिंदू मंदिरों के निर्माण तथा सांस्कृतिक पुनरुत्थान में अतुलनीय योगदान दिया। इसी प्रकार चल्लपल्ली के यार्लगड्डा जमींदारों ने भी अपनी स्वायत्तता बनाए रखी। औरंगज़ेब के शासनकाल के बाद तटीय आंध्र में हुए विद्रोहों का लाभ उठाकर कई कम्मा योद्धाओं ने बड़े भूभागों पर प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित कर लिया। ब्रिटिश काल के दौरान 1802 के स्थायी बंदोबस्त और बाद में रैयतवाड़ी व्यवस्था ने कम्मा समुदाय के भू-स्वामित्व को और सुदृढ़ किया। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने प्रारंभ में अपनी मद्रास सेना में तेलुगु हिंदुओं में से मुख्य रूप से कम्मा, राजू और वेलमा जातियों को ही प्राथमिकता दी।
उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में कम्मा समुदाय के इतिहास ने एक नया करवट लिया, जब ब्रिटिश इंजीनियर सर आर्थर कॉटन द्वारा गोदावरी और कृष्णा नदियों के डेल्टा क्षेत्र में बांधों और नहरों के नेटवर्क का निर्माण किया गया। इस सिंचाई क्रांति और कम्मा किसानों के कड़े परिश्रम ने उन्हें अपार आर्थिक समृद्धि प्रदान की। इस धन संपदा का उपयोग कम्मा समुदाय ने सामाजिक कुरीतियों को दूर करने और शिक्षा के प्रसार में किया। उन्होंने कम्मा महाजन सभा (1910) जैसी संस्थाओं की स्थापना की, आधुनिक शिक्षण संस्थान, पुस्तकालय और स्कूल खोले। इसके परिणामस्वरूप बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में इस समुदाय ने रेड्डी और कापु जैसी अन्य समकालीन जातियों की तुलना में सबसे ऊंची साक्षरता दर प्राप्त की। शिक्षा और संचित पूंजी के बल पर कम्मा परिवारों ने कृषि से आगे बढ़कर परिवहन, खाद्य प्रसंस्करण, फिल्म निर्माण, उद्योग और बैंकिंग क्षेत्रों में निवेश करना शुरू किया। तमिलनाडु के कोयंबटूर क्षेत्र में जाकर बसे कम्मा परिवारों ने वहां के कपड़ा उद्योग (टेक्सटाइल) पर ऐसा एकाधिकार स्थापित किया कि कोयंबटूर को 'दक्षिण भारत का मैनचेस्टर' कहा जाने लगा।
आधुनिक और समकालीन भारत में कम्मा समुदाय का प्रभाव केवल आर्थिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीति, सूचना प्रौद्योगिकी, रियल एस्टेट, मीडिया और भारतीय सिनेमा (विशेषकर टॉलीवुड) में भी इनका अभूतपूर्व दबदबा स्थापित हुआ। वर्ष 1982-83 में कम्मा समुदाय के महान प्रतीक और अभिनेता नंदामुरी तारक रामाराव (एनटीआर) द्वारा तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) की स्थापना ने आंध्र प्रदेश की राजनीति में एक ऐतिहासिक बदलाव लाया, जिसने कांग्रेस के दशकों पुराने वर्चस्व को चुनौती दी। आज पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू, मुख्यमंत्री नारा चंद्रबाबू नायडू जैसी राजनीतिक हस्तियों से लेकर रामोजी राव (ईनाडु समूह), मुरली दिवी जैसे उद्योगपतियों और एस.एस. राजामौली, अक्किनेनी नागेश्वर राव, महेश बाबू जैसी वैश्विक सिनेमाई विभूतियों के माध्यम से यह समुदाय अपनी मेधा का लोहा मनवा रहा है। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध और विशेषकर 1990 के दशक के आईटी बूम के बाद कम्मा समुदाय के युवाओं ने बड़े पैमाने पर संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) की ओर रुख किया, जहां आज वे एक अत्यंत सफल और प्रभावशाली प्रवासी भारतीय (एनआरआई) नेटवर्क के रूप में स्थापित हैं, जो वैश्विक स्तर पर भारत के गौरव को बढ़ा रहा है।

