राजस्थान की वीर प्रसूता माटी के कण-कण में शौर्य और बलिदान की गाथाएं रची-बसी हैं, लेकिन इनमें वीरवर कल्लाजी राठौड़ का नाम एक ऐसे महानायक के रूप में अंकित है जिन्होंने अपने अदम्य साहस और अद्वितीय रणकौशल से इतिहास के पन्नों में अमिट स्थान बनाया। अश्विन शुक्ल अष्टमी, विक्रम संवत 1601 को मेड़ता के राजघराने में जन्मे कल्लाजी राठौड़ पिता अचल सिंह (आससिंह) के पुत्र और मेड़ता के राव जयमल के भतीजे थे, जबकि भक्ति की प्रतिमूर्ति मीराबाई उनकी बुआ थीं। बचपन से ही ज्ञान और वीरता के विलक्षण संगम रहे कल्लाजी ने सामान्य शिक्षा के साथ-साथ योग, औषधि विज्ञान और अस्त्र-शस्त्र के संचालन में असाधारण निपुणता प्राप्त की थी। प्रसिद्ध योगी भैरवनाथ से योग की दीक्षा लेने के कारण उनका व्यक्तित्व आध्यात्मिक और शारीरिक रूप से अत्यंत सुदृढ़ हो गया था। उनके जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया जब मुगल सम्राट अकबर ने मेड़ता पर आक्रमण किया। राव जयमल के नेतृत्व में कल्लाजी ने डटकर मुकाबला किया, किंतु परिस्थितियों के प्रतिकूल होने पर वे चित्तौड़ की शरण में चले गए, जहाँ राणा उदय सिंह ने उन्हें रंधालपुर की जागीर सौंपकर सीमा सुरक्षा का उत्तरदायित्व दिया। उनके जीवन का सबसे मार्मिक और वीरतापूर्ण प्रसंग उनके विवाह से जुड़ा है, जब शिवगढ़ के राव कृष्णदास की पुत्री कृष्णा के साथ फेरों की रस्म पूरी होने से ठीक पहले चित्तौड़ पर अकबर के हमले की सूचना मिली। कर्तव्य को सर्वोपरि मानते हुए कल्लाजी ने अपनी नवविवाहित पत्नी से शीघ्र लौटने का वचन दिया और रणक्षेत्र की ओर प्रस्थान कर दिया। 24 फरवरी 1568 को चित्तौड़ के तीसरे साके के दौरान जब युद्ध भीषण हो गया और सेनापति राव जयमल पैर में गोली लगने के कारण चलने में असमर्थ हो गए, तब कल्लाजी ने अद्भुत रण-चातुर्य का प्रदर्शन करते हुए जयमल को अपने कंधों पर बैठा लिया। दो हाथ जयमल के और दो हाथ कल्लाजी के—जब चार हाथों में तलवारें बिजली की गति से मुगल सेना पर प्रहार करने लगीं, तो शत्रुओं के बीच यह भ्रम फैल गया कि स्वयं चतुर्भुज देव रणभूमि में उतर आए हैं। इसी भीषण संघर्ष में कल्लाजी ने वीरगति प्राप्त की, और जनश्रुतियों के अनुसार सिर कटने के बाद भी उनका धड़ शत्रुओं का संहार करता रहा।

वीरवर कल्लाजी राठौड़ का बलिदान मात्र एक युद्ध का अंत नहीं, बल्कि त्याग और राष्ट्रभक्ति की उस पराकाष्ठा का प्रतीक है जो सदियों से राजस्थान की लोक संस्कृति में जीवित है। आज उन्हें एक सिद्ध लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है, जिनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता है कि जब बात मातृभूमि की रक्षा और धर्म के पालन की हो, तो प्राणों की आहुति भी तुच्छ हो जाती है।

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