भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो अपनी वीरता के साथ-साथ अपने अदम्य आत्मत्याग के लिए अमर हो गए, और उन्हीं में से एक थे जतिन दास। मात्र 24 वर्ष की अल्पायु में अपनी मातृभूमि के लिए प्राणों की आहुति देने वाले इस क्रांतिकारी का जन्म 27 अक्टूबर 1904 को कलकत्ता के एक बंगाली परिवार में हुआ था। मेधावी छात्र रहे जतिन ने कम उम्र में ही अपनी माता को खो दिया था, लेकिन उनके भीतर देशप्रेम की ज्वाला धधक रही थी। 1921 के असहयोग आंदोलन में विदेशी कपड़ों की दुकानों पर पिकेटिंग के दौरान उनकी पहली गिरफ्तारी हुई, जिसने उनके जीवन की दिशा तय कर दी। इसके बाद उन्होंने अनुशीलन समिति जैसे क्रांतिकारी संगठनों के साथ जुड़कर खुद को पूर्णतः राष्ट्र सेवा में समर्पित कर दिया। अपनी स्नातक की पढ़ाई के दौरान ही वे उत्तर बंगाल में बाढ़ राहत कार्यों में सक्रिय रहे और उनकी राजनीतिक सक्रियता के कारण उन्हें बार-बार कारावास झेलना पड़ा। मैमनसिंह जेल में प्रवास के दौरान उन्होंने राजनीतिक बंदियों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के विरुद्ध पहली बार 21 दिनों की भूख हड़ताल की थी, जिसके बाद उन्हें मियानवाली जैसी कुख्यात जेलों में भी स्थानांतरित किया गया।

जतिन दास की वीरता का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय तब शुरू हुआ जब उन्हें 14 जून 1929 को 'लाहौर षडयंत्र केस' के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया। उन पर आरोप था कि उन्होंने भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा असेंबली में फेंके गए उन बमों को बनाने में सहायता की थी, जिनका उद्देश्य केवल गूंगी ब्रिटिश सरकार के कानों तक आवाज पहुँचाना था। लाहौर जेल में बंद होने के बाद उन्होंने देखा कि भारतीय राजनीतिक कैदियों की स्थिति यूरोपीय कैदियों की तुलना में अत्यंत दयनीय थी। गंदे कपड़े, असुरक्षित भोजन और पढ़ने-लिखने की सामग्री का अभाव—इन अमानवीय परिस्थितियों के विरुद्ध जतिन दास ने 13 जुलाई 1929 को ऐतिहासिक भूख हड़ताल शुरू की। जेल प्रशासन ने उन्हें जबरन खिलाने के हर संभव प्रयास किए, लेकिन जतिन का संकल्प हिमालय जैसा अटल था। 63 दिनों तक चले इस अभूतपूर्व संघर्ष ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। उनकी हालत बिगड़ने लगी, तेज बुखार और शारीरिक क्षीणता के बावजूद उन्होंने झुकने से इनकार कर दिया। अंततः 13 सितंबर 1929 को इस महान क्रांतिकारी ने अपने छोटे भाई किरण दास की गोद में अंतिम सांस ली। उनकी मृत्यु के बाद लाहौर से कलकत्ता तक उमड़ा जनसैलाब उनके प्रति राष्ट्र की अगाध श्रद्धा का प्रमाण था, जहाँ पाँच लाख से अधिक लोग उनकी अंतिम विदाई में सम्मिलित हुए।

जतिन दास का बलिदान केवल एक मृत्यु नहीं, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध एक नैतिक विजय थी। उनकी शहादत ने भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के संघर्ष को और अधिक बल दिया और देशवासियों में स्वराज की अलख जगाई। सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें 'भारत का युवा दधीचि' कहा, क्योंकि जिस तरह महर्षि दधीचि ने लोक कल्याण के लिए अपनी अस्थियां दान कर दी थीं, उसी तरह जतिन दास ने भी भारतीय कैदियों के सम्मान और देश की आजादी के लिए अपने शरीर का त्याग कर दिया। रवींद्रनाथ टैगोर से लेकर जवाहरलाल नेहरू तक, देश के हर बड़े व्यक्तित्व ने उनकी वीरता को नमन किया। आज भी जतिन दास का नाम भारतीय युवाओं के लिए साहस, दृढ़ संकल्प और निस्वार्थ सेवा का प्रतीक बना हुआ है, जो हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता की नींव में ऐसे महान नायकों का निस्वार्थ रक्त समाहित है।

Pratahkal HQ

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