कौन थीं जानकी देवी बजाज? भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वह वीरांगना जिन्होंने देश के लिए महलों का सुख और गहने त्याग दिए।
सविनय अवज्ञा आंदोलन में जेल जाने वाली और समाज सुधार के लिए गहने-त्याग करने वाली जानकी देवी बजाज का संघर्ष और राष्ट्र निर्माण में उनका योगदान।

स्वतंत्रता सेनानी जानकी देवी बजाज का जीवन त्याग, साहस और अटूट राष्ट्रभक्ति की एक ऐसी महागाथा है जो भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। 7 जनवरी 1893 को जन्मी जानकी देवी ने एक ऐसे युग में अपनी पहचान बनाई जब महिलाओं का घर की दहलीज से बाहर निकलना भी एक बड़ी चुनौती माना जाता था। प्रख्यात उद्योगपति और गांधीवादी विचारक जमनालाल बजाज की जीवनसंगिनी होने के नाते उनके पास वैभव और सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, परंतु गांधीजी के विचारों और देश की पुकार ने उनके जीवन की दिशा पूरी तरह बदल दी। उन्होंने न केवल पर्दा प्रथा जैसी कुरीतियों का त्याग किया, बल्कि स्वदेशी के संकल्प को अपनाते हुए अपने कीमती रेशमी वस्त्रों और स्वर्ण आभूषणों का मोह छोड़कर खादी को धारण किया। उनके भीतर की क्रांतिकारी ज्वाला तब और प्रखर होकर उभरी जब उन्होंने 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया, जिसके कारण उन्हें ब्रिटिश हुकूमत द्वारा कारावास की सजा भी भुगतनी पड़ी। जेल की सलाखें भी उनके हौसलों को डिगा नहीं सकीं और वे निरंतर समाज सुधार व देश की आजादी के लिए समर्पित रहीं। उनके इसी असाधारण योगदान और निस्वार्थ सेवा को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1956 में देश के द्वितीय सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्म विभूषण' से अलंकृत किया। अपने जीवन के अनुभवों और संघर्षों को उन्होंने वर्ष 1965 में प्रकाशित अपनी आत्मकथा 'मेरी जीवन यात्रा' के माध्यम से दुनिया के सामने रखा, जो आज भी संघर्षशील महिलाओं के लिए प्रेरणा का एक जीवंत स्रोत है। जानकी देवी बजाज केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार थीं, जिन्होंने भारतीय नारी शक्ति को आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान का पाठ पढ़ाया। उनका संपूर्ण जीवन इस बात का प्रमाण है कि दृढ़ इच्छाशक्ति से एक व्यक्ति समाज की रूढ़ियों को तोड़कर राष्ट्र निर्माण में युगांतकारी भूमिका निभा सकता है। आज भी उनकी विरासत भारतीय जनमानस में एक सशक्त समाज सुधारक और निडर सेनानी के रूप में जीवित है, जो आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्र सेवा का मार्ग दिखाती रहेगी।

