कौन थे जयमल राठौड़? चित्तौड़गढ़ के वो महान सेनानी जिन्होंने अकबर की विशाल सेना के दांत खट्टे कर दिए
मुगल सम्राट अकबर द्वारा चित्तौड़गढ़ की घेराबंदी और जयमल राठौड़ के नेतृत्व में राजपूत योद्धाओं के बलिदान व जौहर की पूरी कहानी।

सन् 1567 का वह कालखंड भारतीय इतिहास के सबसे रक्तरंजित और वीरतापूर्ण अध्यायों में से एक है, जब मुगल सम्राट अकबर की विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं ने मेवाड़ की पावन धरा पर दस्तक दी। यह वह समय था जब अकबर अपनी सत्ता को सुदृढ़ करने के लिए राजपूताना के किलों को फतह करने निकला था और इसी क्रम में उसने मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़गढ़ को अपना लक्ष्य बनाया। तत्कालीन शासक महाराणा उदय सिंह ने अपने युद्ध परिषदों की सलाह पर किले की रक्षा का दायित्व अपने सबसे विश्वसनीय और पराक्रमी सेनापति जयमल राठौड़ को सौंपा और स्वयं अरावली की सुरक्षित पहाड़ियों की ओर प्रस्थान किया। 23 अक्टूबर 1567 को जब अकबर ने चित्तौड़गढ़ की घेराबंदी शुरू की, तो उसका सामना आठ हजार घुड़सवारों और स्थानीय सैनिकों की एक ऐसी टुकड़ी से था, जिसका नेतृत्व जयमल राठौड़ और पत्ता चुंडावत जैसे वीर कर रहे थे। अकबर ने इस युद्ध को धार्मिक रंग देते हुए इसे 'जिहाद' घोषित कर दिया था, लेकिन जयमल राठौड़ के अडिग संकल्प के सामने मुगलों की हर चाल विफल होती दिख रही थी। चार महीनों तक चले इस भीषण घेरे के दौरान मुगलों को भारी क्षति उठानी पड़ी; किले की दीवारें इतनी मजबूत थीं कि उन्हें सीधे भेद पाना असंभव था। अकबर ने दीवारों तक पहुँचने के लिए पांच हजार शिल्पकारों से 'साबात' (सुरक्षित सुरंगनुमा रास्ते) और सुरंगे बनवाईं, लेकिन जयमल के नेतृत्व में राजपूत योद्धा दिन में हुए नुकसान की भरपाई रात में ही कर देते थे।
वीरता की इस पराकाष्ठा में केवल पुरुष ही नहीं, बल्कि नारी शक्ति ने भी अद्वितीय बलिदान दिया, जहाँ पत्ता चुंडावत की माता कर्मदेवी और परिवार की अन्य महिलाओं ने युद्ध क्षेत्र में प्राण न्यौछावर किए। संघर्ष का निर्णायक मोड़ 22 फरवरी 1568 की रात को आया, जब जयमल राठौड़ मशाल की रोशनी में किले की टूटी हुई दीवार की मरम्मत करवा रहे थे। इसी दौरान अकबर ने अपनी 'संग्राम' नामक बंदूक से उन पर निशाना साधा, जिससे जयमल गंभीर रूप से घायल हो गए। अपने सेनापति को मृत्युशय्या पर देख राजपूतों ने अंतिम निर्णय लिया और उसी रात किले के भीतर हजारों वीरांगनाओं ने अपने सम्मान की रक्षा हेतु 'जौहर' की अग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया। अगली सुबह होली का दिन था, लेकिन उत्सव के रंगों के बजाय केसरिया बाना पहनकर जयमल और पत्ता के नेतृत्व में राजपूत योद्धाओं ने 'शाका' किया और किले के द्वार खोलकर मुगलों पर टूट पड़े। जयमल राठौड़ ने घायल अवस्था में भी कंधों पर बैठकर युद्ध किया और वीरगति प्राप्त की। किले पर विजय के बाद अकबर ने जो क्रोध और प्रतिशोध दिखाया वह इतिहास में काला धब्बा बन गया; उसने चित्तौड़ के 30,000 निहत्थे नागरिकों के कत्लेआम का आदेश दिया। हालांकि, जयमल और पत्ता की वीरता ने अकबर को इतना प्रभावित किया कि उसने बाद में आगरा के किले के द्वार पर उनकी हाथी पर सवार मूर्तियां स्थापित करवाईं। जयमल राठौड़ का यह बलिदान आज भी मेवाड़ की मिट्टी में गौरव बनकर जीवित है।

